• संगीत: एक पहचान, एक साधना

    संगीत: एक पहचान, एक साधना

    संगीत: एक पहचान, एक साधना संगीत—यह शब्द सुनते ही मन में एक मधुर लहर दौड़ जाती है। हम में से ज्यादातर लोगों को संगीत सुनना बहुत पसंद होता है, क्योंकि संगीत एक ऐसी कला है जिससे न केवल हमारा मनोरंजन होता है, बल्कि मानसिक सुकून भी मिलता है। लेकिन क्या संगीत केवल मनोरंजन मात्र है?…

  • नजरूल : एक विद्रोही कवि

    नजरूल : एक विद्रोही कवि

    आपने यह सुप्रसिद्ध गीत ‘पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई ‘ तो सुना है न? बंगाल की पृष्ठभूमि वाले लोग जानते होंगे कि यह गीत कवि नजरूल इस्लाम के भजन ‘अरुणो कान्ति के गो जोगी भिखारी ‘ पर आधारित है। राधा के कृष्ण से अनन्य प्रेम पर लिखे इस गीत के बोल इतने सुन्दर हैं…

  • जागोरोणे जाय विभावरी

    जागोरोणे जाय विभावरी

    पिछले तीन अंकों में हमने रवीन्द्र संगीत की व्यापक चर्चा की है लेकिन क्या आप जानते हैं कि टैगोर रचित काव्य – गीतों को सबसे पहले किसने रवीन्द्र संगीत की उपाधि दी और टैगोर एकमात्र ऐसे कवि हैं जिन्होंने दो – दो देशों के राष्ट्रगान लिखे हैं।असल में, टैगोर के गीतों को सर्वप्रथम उनके 70वें…

  • अद्यावधि से कुछ अंश

    अद्यावधि से कुछ अंश

    कथक गुरू शंभू महाराज जी को नृत्य के साथ-साथ, गीत गाने में भी महारत हासिल थी, वे ठुमरी ऐसे गाते थे जैसे वे स्वयं माँ सरस्वती के मानसपुत्र हों। वे कहा करते थे कि, ‘ठुमरी दो प्रकार की होती हैं। एक वह जो गायी जाए और दूसरी वह जिस पर अभिनय किया जाए। इस अभिनय…

  • पगला हवार बादोल दिने

    पगला हवार बादोल दिने

    एक कहावत है कि ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’…अब गुरुदेव तो रवि भी थे और कवि भी तो उनकी दृष्टि से कोई भी भाव भला कैसे अछूता रहता? कहते हैं कि कविगुरु के जीवन में उनकी भाभी कादम्बरी देवी का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान था। दोनों में बड़ी गहरी आत्मीयता थी, हालांकि सामाजिक तौर…

  • तेरे मेरे मिलन की ये रैना

    तेरे मेरे मिलन की ये रैना

    बंगाल के इतिहास जितना ही पुराना है बंगाल का कला – संस्कृति के प्रति अनुराग! लक्ष्मी के ऊपर सदा ही सरस्वती को प्राथमिकता दी है बंगालियों ने। यहां के बच्चे बोलने से पहले आलाप लेना सीख जाते हैं, तबले पर थाप देना सीख जाते हैं। हर पारंपरिक बंगाली घर में आपको तानपूरा, तबला, हारमोनियम आदि…

  • छूकर मेरे मन को

    छूकर मेरे मन को

    संगीत संभवतः वह पहली नैसर्गिक कला है जिससे मनुष्य परिचित हुआ। झरनों की कल-कल, सागर के ज्वार, पक्षियों का कलरव, हवा की सरसराहट…इन सबमें संगीत है। स्वाभाविक है जब इसका प्रसार असीमित है तो इस कला को श्रेणियों में विभक्त करना भी कठिन होगा। तो आपका अधिक समय न लेते हुए आज बातें समृद्ध सांस्कृतिक…