छूकर मेरे मन को

संगीत संभवतः वह पहली नैसर्गिक कला है जिससे मनुष्य परिचित हुआ। झरनों की कल-कल, सागर के ज्वार, पक्षियों का कलरव, हवा की सरसराहट…इन सबमें संगीत है।

स्वाभाविक है जब इसका प्रसार असीमित है तो इस कला को श्रेणियों में विभक्त करना भी कठिन होगा।

तो आपका अधिक समय न लेते हुए आज बातें समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा वाले राज्य बंगाल के जनप्रिय संगीत रवीन्द्र संगीत की जिसके शब्दों और संगीत की रचना स्वयं महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) ने की थी।

टैगोर ठुमरी गायन से बहुत प्रभावित थे और संगीत से उन्हें स्वाभाविक रूप से प्रेम था। विदेश यात्राओं ने उनके अनुभवों को विस्तार दिया और कर्नाटक संगीत से भी वे बहुत प्रभावित हुए।

उनका मानना था कि बंगाल का कोई ऐसा मौलिक संगीत हो जो विश्व भर में अपनी विशिष्ट शैली के लिए जाना जाए। तो इस प्रकार रचना हुई रवीन्द्र संगीत की जिसे आज भी न केवल बंगाल बल्कि पूरे देश, पूरे विश्व में गाया – गुनगुनाया जाता है।

अपनी मधुर और शांतिपूर्ण धुनों के कारण फिल्म जगत में भी रवीन्द्र संगीत को हाथों-हाथ लिया गया है और कितने ही गीतों की धुनें इससे प्रेरित होकर बनाई गई हैं।
प्रस्तुत है ऐसे ही कुछ लोकप्रिय गीतों की सूची –

1.जदि तारे नाय चिनि गो शेकि/ तेरे मेरे मिलन की ये रैना
2.तोमार होलो शुरू आमार होलो शारा/ छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा
3.जागोरोणे जाय बिभावरी/ज़िन्दगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो
4.पगला हवा पागोल दिने/बंधन खुला पंछी उड़ा
5.मम चित्ते नित नित्ये के जे नाचे/मेरे मन की धड़कन में

अच्छा, इसी सूची में से बात करते हैं गीत ‘छूकर मेरे मन को’ की जिसे ‘तोमार होलो शुरू ‘ की तर्ज पर बनाया गया था। यह गीत 1981 में आई फिल्म ‘याराना’ में है। यह फिल्म तो हिट थी ही, लेकिन अमिताभ बच्चन और नीतू सिंह पर फिल्माया गया यह गीत सुपरहिट रहा था। गीतकार अनजान ने इस गीत में प्रेम और समर्पण के मधुर भावों की अद्भुत अभिव्यक्ति की है। एक बानगी देखिए –

आजा तेरा आंचल ये, प्यार से मैं भर दूं, प्यार से मैं भर दूं
खुशियां जहां भर की, तुझको नज़र कर दूं, तुझको नज़र कर दूं
तू ही मेरा जीवन, तू ही जीने का सहारा
छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा!

संगीतकार राजेश रोशन की मधुर धुनों से सजा और किशोर कुमार की जादुई आवाज में रिकॉर्ड किया गया यह गीत बहुत ही कर्णप्रिय बन पड़ा है। लगभग चार दशकों के बाद भी इस गीत की चमक फीकी नहीं पड़ी है। आलेख लंबा हुआ जा रहा है तो इसे यहीं समाप्त करने की आज्ञा चाहूंगी। आलेख की अगली कड़ी में ऐसे ही किसी और गीत की चर्चा होगी। तब तक के लिए नमस्कार!

अर्चना आनन्द भारती

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