एक कहावत है कि ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’…अब गुरुदेव तो रवि भी थे और कवि भी तो उनकी दृष्टि से कोई भी भाव भला कैसे अछूता रहता? कहते हैं कि कविगुरु के जीवन में उनकी भाभी कादम्बरी देवी का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान था। दोनों में बड़ी गहरी आत्मीयता थी, हालांकि सामाजिक तौर पर ऐसे संबंध हमेशा संदेह के घेरे में रहते हैं लेकिन मन पर किसका नियंत्रण है? और फिर जो सामर्थ्यवान हैं उन्हें तो नियंत्रण की आवश्यकता ही नहीं। ये सब तो मध्यवर्ग की चर्चाओं के विषय हैं। तो, टैगोर जब उच्च शिक्षा के लिए विदेश चले गए तो कादम्बरी देवी अपने ठाकुरपो (बांग्ला में देवर के लिए प्रयुक्त शब्द) का वियोग न सह सकीं और आत्महत्या कर ली।
भाभी की असामयिक मृत्यु से टैगोर के जीवन में कभी न खत्म होने वाला शून्य व्याप्त हो गया। उनके हृदय की पीड़ा उनकी रचनाओं को पोषण देती रही और कविगुरु ने लगभग 2500 अविस्मरणीय गीत लिख डाले। बांग्ला वांग्मय को समृद्ध बनाने में रवीन्द्रनाथ ठाकुर का योगदान अतुलनीय है, इसकी तुलना तो छोड़िए इसकी बराबरी की बात सोचना भी असंभव है। व्यक्तिगत क्षति और विश्वभर की यात्राओं ने रवि के कविमन को भरपूर विस्तार दिया। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में छायावाद की छाप भी स्पष्ट देखी जा सकती है।
तो, आज चर्चा ऐसे ही एक कालजयी गीत ‘पगला हवार बादोल दिने’ की जो आगे चलकर हिन्दी गीत ‘बंधन खुला पंछी उड़ा ‘ की प्रेरणा बना। प्रेम के निस्सीम विस्तार पर लिखे गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं –
पगला हवार बादोल दिने
पागोल आमार मोन जेगे ओठे
पूरा गीत तो नहीं लिख रही लेकिन इसका आशय कुछ यों है कि एक मेघाच्छादित सांझ को जब हवाएं मतवाली सी झूम रही थीं, मेरा मतवाला मन भी जाग उठा था। प्रतीकात्मक शैली में लिखे इस गीत में एक अनचीन्हे, अनजाने को पुकार लगाता एक मन है। जैसे आकाश में बादल छाए हैं, वैसे ही कवि का संवेदनशील मन आशंकाओं से घिरा हुआ है। क्या वह (अपरिचित) घर के बाहर से ही लौट जाएगा? क्या यह मन जो उस अनजाने के पीछे भाग रहा है, कभी घर लौटकर आ पाएगा? अब जबकि सारी दीवारें ढह चुकीं, घर टूट चुका?
इन पंक्तियों में एक अकथनीय पीड़ा है जो आप इस गीत को सुनकर समझ सकते हैं। तो, इस गीत की गूंज बॉलीवुड तक पहुंची और इसके संगीत से प्रेरणा लेकर गीत बना ‘बंधन खुला पंछी उड़ा ‘। फिल्म थी ‘युगपुरुष’ जिसमें नाना पाटेकर और मनीषा कोइराला जैसे मंजे हुए कलाकारों ने अभिनय किया था। बोल मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने लिखे थे और संगीत राजेश रौशन ने दिया था। गीत मनीषा कोइराला पर फिल्माया गया है और उनकी स्वाभाविक अभिनय शैली ने इसे जीवंत कर दिया है।
अब आप इसे प्रेरणा कहें या नकल लेकिन सच तो यही है कि इस गीत की धुन पूरी तरह उपरोक्त गीत पर आधारित है। लेकिन मुंबई फिल्म जगत के संगीतकारों की अनुदारता ही कहेंगे कि उन्होंने फिल्म में कहीं भी टैगोर का जिक्र तक नहीं किया है। प्रेरित होना बुरा नहीं है, कला जगत में प्रेरणा लेना कोई नई बात भी नहीं है लेकिन मूल रचनाकार की चर्चा अवश्य की जानी चाहिए ताकि दर्शक/पाठक मूल रचनाकारों और उनकी धरोहरों से परिचित हो सकें। कला सीमाहीन होती है और शब्द ब्रह्म होते हैं तो देर सवेर लोग मूल रचनाकार तक अवश्य पहुंच जाते हैं। नकल साबित होने से स्थापित संगीतज्ञों की छवि पर भी बट्टा लगता है। इसलिए संगीतकारों को प्रस्तुति देते समय थोड़ी ईमानदारी बरतनी चाहिए।
अब मैं आलेख यहीं समाप्त करने की अनुमति चाहूंगी।आप इस संदर्भ में क्या विचार रखते हैं, मुझे अवश्य बताएं। अच्छा, क्या आप भी ऐसे किसी प्रेरित गीत से परिचित हैं या जानना चाहते हैं तो मुझे अवश्य बताएं। मैं यथासंभव आपकी जिज्ञासा शान्त करने का प्रयास करूंगी। तब तक के लिए आज्ञा दें, नमस्कार!
अर्चना आनन्द भारती
