बंगाल के इतिहास जितना ही पुराना है बंगाल का कला – संस्कृति के प्रति अनुराग! लक्ष्मी के ऊपर सदा ही सरस्वती को प्राथमिकता दी है बंगालियों ने। यहां के बच्चे बोलने से पहले आलाप लेना सीख जाते हैं, तबले पर थाप देना सीख जाते हैं। हर पारंपरिक बंगाली घर में आपको तानपूरा, तबला, हारमोनियम आदि वाद्ययंत्र अवश्य मिल जाएंगे। कहते हैं कि बंगाली कभी बेसुरा नहीं होता। रत्नगर्भा बंगाल की धरती ने असंख्य असाधारण प्रतिभाओं को जन्म दिया है। तो, इसी उर्वर भूमि पर जन्मे एक विराट कवि ने कुछ अद्भुत छंद रचे और उन्हें कुछ ऐसी कालजयी धुनों से संवारा कि अनंतकाल तक वह भारत के जनमानस को झंकृत करती रहेंगी।
आज चर्चा ऐसे ही एक सुमधुर गीत ‘जदि तारे नाय चिनि गो शेकि ‘ की जो आगे चलकर फिल्म ‘अभिमान’ के सुप्रसिद्ध गीत ‘तेरे मेरे मिलन की ये रैना ‘ की प्रेरणा बना।
गीत के प्रथम अंतरे में जो बोल हैं उनका अर्थ है ‘यदि मैं उसे (प्रेयसी) को न पहचान पाऊं, क्या वह मुझे फाल्गुन के विशेष दिन (आप होली का दिन समझें) को पहचान लेगी? क्या वह किसी कली के कान में मेरी बातें हौले से कह देगी? क्या वह फाल्गुन मास के इस दिन विशेष को मेरा हृदय चुरा लेगी?
कैसी कोमल भावनाएं? कैसी निष्पंक अभिव्यक्ति? कभी – कभी उस समय के भोलेपन पर आश्चर्य होता है जिसमें कविगुरु रवीन्द्र ने प्रेम का ऐसा उदात्त चित्रण किया था। प्रेम की ऐसी सरल अभिव्यक्ति पर कौन न मर मिटे?
तो, इस गीत के माधुर्य ने संगीतकार एस डी बर्मन को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने फिल्म अभिमान के गीत ‘तेरे मेरे मिलन की ये रैना ‘ को हूबहू यही धुन दे दी। अब क्योंकि धुन वही थी तो उनपर दायित्व था कि मौलिक गीत के अनछुए माधुर्य को यथावत रखते हुए कुछ ऐसा तैयार करें कि सुनने वाले वाह – वाह कर उठें। तो बर्मन साहब के लिए गीत लिखा मजरूह सुल्तानपुरी ने जिसके बोल कुछ यों थे –
तेरे मेरे मिलन की ये रैना – 2
नया कोई गुल खिलाएगी – 2
तभी तो चंचल हैं तेरे नैना
देखो ना, देखो ना
तेरे मेरे मिलन की ये रैना
गीत नायक – नायिका के भविष्य की कल्पना को बड़े ही शालीन शब्दों में व्यक्त करता है और मूल गीत को सुनने के बाद भी इसकी ताजगी कम नहीं होती। सदाबहार गायक किशोर कुमार व स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज में यह गीत बहुत ही कर्णप्रिय बन पड़ा है। 1973 में आई निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी की इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी की जोड़ी ने इतना स्वाभाविक अभिनय किया है कि आज भी यह फिल्म लोगों की पसंदीदा फिल्मों में सूची में शामिल है। तो यदि अब कभी आप इस गीत को सुनें तो इस गीत से जुड़े इन सभी महान व्यक्तियों को भी अवश्य याद करें। यही हमारी इन कलाकारों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अच्छा, कहते हैं कि हृषिकेश मुखर्जी ने किशोर कुमार और उनकी पहली पत्नी श्रीमती रूमा गुहा ठाकुरता के जीवन से प्रेरणा लेकर ही इस फिल्म की पटकथा तैयार की थी।
बताना चाहूंगी कि रूमा गुहा ठाकुरता की बहन श्रीमती नीहार गुहा ठाकुरता लंबे समय तक लेखिका की पड़ोसन रही हैं। तो कुछ गल्प, कुछ तथ्य उनसे भी प्राप्त किए गए हैं। तो, अब इस आलेख को यहीं समाप्त करने की आज्ञा चाहूंगी। आलेख की अगली कड़ी में ऐसे ही किसी अन्य गीत की चर्चा होगी लेकिन आपकी प्रतिक्रिया ही तय करेगी कि यह श्रृंखला कितनी लंबी चलेगी। तब तक के लिए आज्ञा चाहूंगी, नमस्कार!
