मोक्ष हो तुम जीवनी
हर्ष की पर्याय हो,
गर्व की अनुभूति हो
दान में अन्याय हो।
तोड़ पिंजर नभ उड़ो
वर्जनाएँ छोड़ दो,
तथ्य से जो दूर हो
पृष्ठ सारे मोड़ दो।
स्वप्न हो मेरे लिए
मर्म हो शुभ न्याय हो!
धूप हो तुम शीत की
ग्रीष्म की तुम छाँव हो,
हो तलैया की लहर तुम
ख़ुशनुमा सी गाँव हो।
नेह की उपमान हो
गेह की देवाय हो॥
• शुभेन्द्र कुमार जायसवाल

कविता विशेष अंक में इस दिवस विशेष रचना को स्थान देने के लिये कविता जंक्शन पटल का हार्दिक आभार 🙏🏻