गीत: हर बेटी का सपना है

धरा गगन का कोना कोना,
हर बेटी का अपना है।
हरी – भरी धरती सा होना,
हर बेटी का सपना है।

हृदय तप्त है आज धरा का,
आतप अत्याचारों से।
तपकर तृप्त हृदय होगा कल,
शीतल नवल फुहारों से।

अन्तर्मन की तपोभूमि में,
हर बेटी को तपना है।
हरी भरी धरती सा होना,
हर बेटी का सपना है।


आर्तनाद को आकुल वसुधा,
मन ही मन में घुटती है।
जो है सदा लुटाने वाली,
आज वही क्यों लुटती है।

क्रान्तिपत्र के प्रथम पृष्ठ पर,
हर बेटी को छपना है।
हरी भरी धरती सा होना,
हर बेटी का सपना है।


हरियाली के हिरन हाँफते,
अपने ही प्रतिहारों से।
हीरामन उड़ गये काँपते,
पिंजरे के अधिकारों से।

शुष्क हृदय के शुद्धिकर्म में,
हर बेटी को खपना है।
हरी भरी धरती सा होना,
हर बेटी का सपना है।

क्षिति नयनों में भाव क्षोभ के,
मन में लेकिन ममता है।
क्षितिपतियों का क्षात्र क्षीण पर,
क्षमा क्षोणि की क्षमता है।

भग्न हृदय की आज भव्यता,
हर बेटी की नपना है।
हरी भरी धरती सा होना,
हर बेटी का सपना है।

बल धरती का सर्वजीत है,
अबला की संज्ञा झूठी।
ध्वंस हुआ अतिक्रामक का जब,
वसुधा की तन्द्रा टूटी।

अपने अधिकारों की माला,
हर बेटी को जपना है।
हरी – भरी धरती सा होना,
हर बेटी का सपना है।


अशोक व्यग्र
भोपाल।

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1 Comment
शुभेन्द्र
8 months ago

बहुत ही सुन्दर.. मनहर शब्द शिल्प सार्थक भाव 👌👌