रवि जगमगाएगा फिर से

क्यों बने संकल्प पथ पर
वह चरण जो धूल पर
जल रहे होंगे सितारे
उस सिंधु के कूल पर
प्रश्नचिह्न उनके चरणों पर
जिनको खुद चलना होगा
दिनकर तुम रहना सजग
आख़िर तुम्हें ही जलना होगा।

भरी रात्रि के अँधियारे में
अश्रु बहकर खुले नयन से
लुढ़क-लुढ़क कर इस तरह वह
तुमको ही बतलाएगा।
विस्तृत नभ के आँगन में
नित्य दिवस की परछाई पर
राग खेलते शलभों पर
मंच बनाया जाएगा
दिनकर तुम रहना सजग
आख़िर तुम्हें ही जलाया जाएगा ।

रुकते-रुकते कहाँ रुके वो
जो चले ज्योति-सा खुद को लेकर
पल्लव पर फैली रश्मि से
कलरव करते नित्य विहान में
अनावृत गगन की बेला में
दीपक को रमाया जाएगा
दिनकर तुम रहना सजग
आख़िर तुम्हें ही जलाया जाएगा।

राकेश यामिनी के द्वारे पर
नीचे फैली इस ज्योत्सना पर
क्षण-भर में भंगुर हो रहे
शीशे के उन महलों पर
प्रतिबिम्ब बनाया जाएगा
अवसान खिलती रुचिर शोभा पर
अचला के उस अजिरा में
रवि जगमगाएगा फिर से
उस तिमिर के आसरे में भी
प्रश्नचिह्न बनाते उन परिंदों से
एक बार तुम फिर से पूछो
इन गीदड़ों से डरकर तुम
किस शहर में जाओगे
मुसाफ़िर तुम रहना सजग
आख़िर तुम ही जलाए जाओगे।

विघ्न-भरी इस दुनिया में
रुक-रुककर भी न रुका जो
निकलती निर्झणियों से पूछो
हिमालय कब तक रोता जाएगा?
बढ़ती सन्ध्या के घनघोर अंधकार में
उड़ते-उड़ते उस हारिल को
कितनी बार रुलाया जाएगा?

दिनकर तुम रहना सजग
ख़तरा तुम्हीं पर मँडराएगा
अपनी इस औदार्य महिमा से
फैली घोर धुन्ध से आगे
तुझको खुद ही निकलना होगा
प्रश्नचिह्न बनाते धरती पर
धूलि को रंजित काया से
खुद को यह बतलाते हुए
शूलों पर चलना होगा
मुसाफ़िर तुम रहना सजग
आख़िर तुम्हें ही जलना होगा।

रण-भूमि में लड़कर तुझको
विजय स्तम्भ गढ़ना होगा
परिस्थितियों से नेत्र मिलाकर तुझे
युद्ध-भूमि पर चलना होगा
रुकना कहाँ है
यह देख रहा वह
खुद को लेकर चलना होगा
शर्वरी के उर में शिखा जलाकर तुझको
वक्त से आगे निकलना होगा
जहाँ न पहुँचा वक्त स्वयं भी
तुझको वहाँ पहुँचना होगा
पथिक क्यों डर रहा हैं कंकड़ों से
उन्हें हटाकर खुद ही तुझे
इतिहास नया एक रचना होगा
दिनकर तुम रहना सजग
आख़िर तुम्हें ही जलना होगा।

गरजते अम्बर की सौदामिनी में
बैठे हुए उस तरुवर के नीचे
जत्था कुछ विहंगमों का
उदासी छाई उनके नयनों पर
अपने घर से दूर हो चले
किसी राह के पथिक से पूछो
क्या-क्या कष्ट उठाने होंगे
क्यों रो रहा आज गगन यह
क्या अपनी पस्थितियों के मारे?
झुरमुट की डाली पर बैठे
क्यों रो रहे हंस बेचारे?
तुमको ही इस भरी रैन में
बुझी पड़ी अनजान शमा को
फिर से तुझे जलाना होगा

राजीव दृग-सा चमक रहा है
लग रहा है कुन्दन काया सा
हे अनन्त ! तुम उसे पहचानो
जो जल रहा आपकी माया-सा
घनघोर अंधकार की झंझानिल वर्षा में
तुम को खुद लड़ना होगा
मुसाफ़िर तुम रहना सजग
आख़िर तुम्हें ही चलना होगा।

नवनीत कुमार
हिंदी विशेष, द्वितीय वर्ष
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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