क्योंकि मौका शिक्षक-दिवस का था, तो निबंध-प्रतियोगिता जैसी वारदात का शीर्षक था- शिक्षक। छात्रों ने ऐसे-ऐसे निबंध लिखे कि तमाम शिक्षक भयंकर रूप से भावुक हो गए। खुशी में इतना रोए, कि कई का तो दम निकल गया। यहाँ तक कि नेता पक्ष-विपक्ष, अभिनेता, मवाली-बवाली और हर रुलाने वाला व्यक्ति दहाड़े मारकर रो पड़ा था। जिस छात्र के निबंध को प्रथम पुरस्कार के लिए चुना गया, उसका निबंध भावनाओं से अनुबंधित नहीं था। वहाँ के अख़बारों ने पीएम-सीएम-डीएम की तारीफ़ों के पुल बीच उसके निबंध का फ़्लाइओवर पहले पन्ने पे निकाला था। उसी के कुछ अंश यहाँ पेश-ए-ख़िदमत है:
‘शिक्षक हम सबकी भांति एक प्राणी ही होता है। वह आम से भी ज़्यादा आम इंसान जैसा दिखता है। हमारे देश में शिक्षक बहुतायत में हैं। वैसे भी हर आदमी यहाँ राय देता है। उस हिसाब से सब शिक्षक हैं। असल शिक्षक के दो पैर व दो हाथों के साथ बाकी अंग समान्य मनुष्य की भांति ही होते हैं। बस उसकी आँखें चार व चार पैर होते हैं। दो आँखें-दो पैर अदृश्य होते हैं, मगर होते ज़रूर हैं। यह प्रमाणित भी है। परीक्षा के समय वह जहां भी हो, नकल करने वाले छात्र को दबोच ही लेता है। वह खुद भले ही बोर्ड की ओर देख रहा हो, मगर भिनभिनाहट भरी आवाज़ों के बीच से भी वह सुन लेता है कि किसने क्या कहा।’
शिक्षक व नेता में कुछ ज़्यादा फर्क नहीं है। दोनों ही लीडर होते हैं अपने-अपने क्षेत्र के। दोनों ही बोलने मे माहिर होते हैं। एक ‘किताबों की बात करता है। दूसरा मन-तन-धन की बातें करता है। जो फर्क है, वह बस यही कि समान्यतः शिक्षक कत्ल नहीं करते। ज्ञात व अज्ञात कारणोंवश वे लाशों कि सीढ़ियों पर ऊपर नहीं चढ़ पाते।’
संसार के कई लोकतांत्रिक राष्ट्रों में शिक्षक की दो महत्वपूर्ण प्रजातियाँ पाई जाती हैं। एक सरकारी। दूसरी प्राइवेट। जैसे सरकारें मनमानी करती हैं, वैसे ही सरकारी शिक्षक भी मनमानी करता दिखता है। सरकारी शिक्षक का जीवन असरकारी होता है। जितनी अधिक कमाई लेता है, उतनी कम पढ़ाई देने में भरोसा रखता है। उन्हें अपनी कक्षा के अलावा बहुत सी गणनाएँ करनी होती है। उन्हें ध्यान रखना पड़ता है कि पढ़ाई हो या न हो, एमडीएम में छिपकली इत्यादि नहीं होनी चाहिए। इसलिए वे अधिकतर समय एमडीएम बनाने वाले हलवाइयों संग साठ-गांठ बांध बैठ जाते हैं। वे इतना ज्यादा व्यस्त हो जाते हैं कि कई बार यही भूल जाते हैं कि पाठ्यक्रम क्या है। क्योंकि वह सरकारी है, इसलिए उसके बारे में कम लिख रहा हूँ। वरना सरकार की भावनाएं तहस नहस हो जाएंगी। दुनिया जानती है कि सरकार के किसी करीबी की भावनाओं का तहस-नहस होना, मतलब निबंध लिखने वाले का जीवन तहस-नहस होना।
अब बात करते हैं प्राइवेट सैक्टर वाले शिक्षक की। वह प्राइवेट सैक्टर का है, इसलिए उसपर जितना लिखें, कम है। यह प्राणी अलग ही मिट्टी का बना होता है। वह जानता है जीने के लिए जो उसके पास जो है वह कम है। फिर भी वह यही कहेगा अभी बहुत दम है। कोविड में भी नहीं माना। मौत को मुंह चिढ़ाकर पढ़ाने पहुँच गया। ऐसे मरें, या वैसे, बात एक ही है। उसके पास ‘बार्गेनिंग-पावर’ बेहद कम होती है। वह कैशबैक का मारा व्यक्ति होता है। वह ऐसा व्यक्ति है जो अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल, मगर कारवां न बन सका। सरकारी और गैरसरकारी शिक्षक के इस बहस का मात्र एक निष्कर्ष निकलता है। यह कि जिसे जहां नहीं होना चाहिए, वह वहीं पर जमा हुआ है। यह कहने वाला कोई प्राइवेट शिक्षक ही रहा होगा कि ‘मिट नहीं सकता मिटाए से लिखा तक़दीर का, बस नहीं चलता कुछ तक़दीर पर तदबीर का।’
काल-खंड के हिसाब से शिक्षक के दो प्रकार होते हैं। एक ‘हमारे ज़माने वाले शिक्षक’ और दूसरे ‘आधुनिक शिक्षक।’ हमारे जमाने वाले शिक्षक के बारे में हमने अपने ही शिक्षकों से सुन रखा है। हमारे शिक्षक बताते हैं कि उनके ज़माने वाले शिक्षक के आगे कोई चूँ तक नहीं कर सकता था। जो पढ़ाया जाता था, वही पत्थर की लकीर था। यदि शिक्षक क्रूर होकर उन्हें पीटते थे, तो घरवाले क्रूरतम होकर और ज़्यादा पीटते थे। मगर आज ऐसा नहीं है। आधुनिक शिक्षक अलग होता है। वह अभिभावकों, सरकारों और विद्यार्थियों के बीच दबा हुआ ट्रिपल-लेयर का सैंडविच कहलाता है। आज का शिक्षक संसद का अध्यक्ष सरीखा है। बैठ जाइए, चुप हो जाइए, मेंटेन डिसिप्लिन, प्लीज़ , नो, नहीं न न न , यह व्यावयहार ठीक नहीं, आदि बोल सकता है। असल में कुछ कर नहीं सकता। वह कार्यवाही करने की धमकी ही दे सकता है। वह भी इस लहज़े में कहेगा कि मानों धमकी नहीं, प्यार जता रहा हो। वह पुलिस की दुनाली की वह गोली है जो कभी बाहर नहीं निकल पाती।
आधुनिक शिक्षक यदि कुछ कर सकता है, तो बस मिन्नतें।
• अभिषेक अवस्थी
