हास्य कविता

1.

लगे जो कोकिला तुमको कहीं कौआ नहीं निकले।
लगे जो हंसिनी तुमको कहीं बगुला नहीं निकले।
जमाना फेसबुक इंस्टा का है इसमें संभलना तुम
तुम्हारी फेवरेट लड़की कहीं लड़का नहीं निकले।

सुबह उठते ही पहले हाथ में बस फोन दिखता है।
नशा ये फेसबुक का है चढ़ा जो रोज रहता है।
मुझे डॉक्टर ने बुलवाया छुड़ाने फेसबुक की लत,
मगर अब वो भी मेरी पोस्ट लाइक रोज करता है।

दिखाये वो सदा आँखें जो पकड़ा झूठ जाता है।
मना लेने की चाहत में वो अक्सर रूठ जाता है।
कभी फँसना नहीं तुम शोना बाबू वाले चक्कर में,
नया बाबू जो मिलता है पुराना छूट जाता है।

समझते हो तभी तुम एक जब तुमको लगाती हूँ।
मैं अपनी डांट के बल पर सही तुमको चलाती हूँ ।
भले कितना ही नाचो बैंड बाजे ढोल की धुन पर
मगर तुमको इशारों पर तो केवल मैं नचाती हूँ।

2.

इस मगज का बनाया है ऐसा दही
क्या बताऊं कि क्या जायका बना गया।
दोस्त बूंदी से मुझको मिले इस तरह,
जिंदगी का मेरी रायता बन गया।

खुद को ज्यादा हवा में उड़ाना नहीं।
बात कोई कभी तुम बढ़ाना नहीं।
टांग लम्बी भले हो तुम्हारी मगर,
काम में दूसरों के अड़ाना नहीं।

फूल भी उनको कांटे चुभाने लगे।
प्रेम के गीत भी अब सताने लगे।
सांत्वना उनको मेरी तरफ से है जो
पापा के बदले मामा कहाने लगे।

रोको उनको बिना बात जाने नहीं।
दोस्त जो आपकी बात माने नहीं।
लाख रोका बसंती को वीरू ने था
पर बसंती बिना नाचे माने नहीं।

3.

मित्र मेरे सभी एक जैसे प्रभो
कर्म का फल उन्हें आप कल दीजिए।
उनके पुण्यों के फल सब मुझे प्राप्त हों,
पाप के फल हमारे उन्हें दीजिए।

पास आए समस्या विकट वो लिए।
मुझसे बोले नया जायका दीजिए।
आज ही ट्राई करना बताया उन्हें,
चाय में रायता डालकर पीजिए।

बात निर्भर है तुम पर तनिक जन लो,
खोज लो सुख या दुःख में सदा गुम रहो।
देखना एक दिन वैद्य बोलेंगे ये,
पोस्ट अवधेश की देखते तुम रहो।

दूध से देखो पोषण हैं मिलते नहीं।
तो बुढ़ापे में जबड़े भी हिलते नहीं।
शक्ति होती अगर दूध में तब तो फिर,
दूध के दांत बिल्कुल भी गिरते नहीं।

4.

एक कवयित्री द्वारा पति की पोल खोल

छिपाती हूँ उमर बस मैं बहुत कुछ तुम छिपाते हो
सही वेतन भी मुझको तुम कहाँ अपना बताते हो।

पुरुष के नाम रखते लड़कियों के तुम सभी नम्बर
मेरे बस फोन छूने भर से तुम तो काँप जाते हो।

तुम्हारी तोंद का प्रेशर बटन जब शर्ट के तोड़े
बहाना गैस का साजन गज़ब ही तुम बनाते हो।

बता दूँगी सभी को मैं तुम्हारे सिर के बारे में
छिपाने चाँद को अपने रोज तुम विग लगाते हो।

देखकर जो पड़ोसन को बहुत तुम मुस्कुराते हो
कहीं न जान जाए तुम दांत नकली लगाते हो।

फटे मोजे से जैसे झाँकता कोई अंगूठा है
खिड़कियाँ खोल वैसे ही ये मुखड़ा तुम दिखाते हो।

मेरी पायल की छन छन में समाया है हुआ जादू
तनिक आवाज सुनते ही फोन अपना छिपाते हो।

नहीं मैं धोऊंगा बर्तन लगाऊंगा नहीं पोछा
ये कह के रोज मेरा दिल बड़ा तुम दुखाते हो।

नहीं है सामने मेरे तुम्हारी हैसियत कुछ भी
मगर सारे जहाँ में शेर खुद को तुम बताते हो।

अवधेश कनौजिया ‘अद्वैत’
हास्य कवि,नई दिल्ली से

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुवासितम् साहित्यिक संस्था।दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक।अनेक साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाओं में साहित्यिक योगदान।बांसुरी वादन और चित्रकला में रुचि।अनेक साहित्यिक व सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।2020 में पंजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित लघु कथा प्रतियोगिता ने प्रथम पुरुस्कार।विश्व रिकॉर्ड कवि सम्मेलन, और हास्य कवि सम्मेलन के विश्व रिकॉर्ड में प्रतिभागिता व सम्मान।इंडियन डायमंड डिगनिटी अवॉर्ड 2024 समेत अनेक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पुरुस्कार।

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