महिमा संचालक की

फिल्मी लोग जिस तरह फिल्म बनाते वक्त क्रियेटिव लिबर्टी अर्थात कलात्मक आजादी लेते है,किसी भी कहानी को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत कर डालते हैं । उसी तरह कवि सम्मेलन का संचालक होता है जो बहुत ही क्रियेटिव तरीके से आजादी लेता है ।
वो संचालक ही होता है जिसे पूरा हक होता है किसी की भी कविताएं सुनाए, घिसे-पिटे चुटकुले सुनाए तो कभी किसी कवयित्री से छिछोरे मजाक करे तो कभी मनगढ़ंत किस्से सुनाए । संचालक पूरे समय… समय की बात करते हुए… समय को सलीके से चुटकुले और दूसरों की लिखी कविताओं के साथ हजम कर जाता है और हर आने वाले कवि को समय के सदुपयोग का पाठ याद कराता रहता है ‘कवि मित्र समय सीमा का ध्यान रखें,हमारे पास समय कम है इसलिए एक ही रचना सुनाएं’ आदि आदि इत्यादि।
मंचासीन कवियों में किसके साथ संचालक के मधुर और किसके साथ कटु संबंध हैं ,ये संचालक जी की बातों और हाव-भाव से पता लग जाता है क्योंकि संचालक ही मंच का सर्वेसर्वा होता है। उसी के हाथ में होता है कि किसे मंच पर कब लाना है।किसे हिट और किसे हूट करवाना है ! कवि सम्मेलन और क्रिकेट मैच में बहुत ज्यादा अंतर नहीं, संचालक भी क्रिकेट के कप्तान की तरह समझदारी से बल्लेबाज अर्थात कवि चुनकर कार्यक्रम को शानदार बना सकता है । किससे ओपनिंग करानी है, किसको बाद में लाना है, ये उसी का निर्णय होता है । इसी बहाने वो खुन्नस बड़े ही मोहक अंदाज में निकाल डालता है जैसे धोनी के बाद किसी साधारण बल्लेबाज को उतारा जाए तो क्या हश्र होगा ।वहीं किसी जमने वाले कवि के बाद हल्के कवि को भेज देंगे तो कवि बेचारा हिट विकेट हो ही जाएगा। पर संचालक जी कातिल मुस्कान के साथ एक और चुटकुला पटक मारेंगे और जता देंगे “मुझसे पंगा लिया न बच्चू अब देख !”
इस दुनिया में यदि सबसे धैर्यवान प्राणी की बात होगी तो कवियों का नाम सबसे ऊपर आएगा क्योंकि पाँच मिनट की कविता के लिए ये कवि रूपी प्राणी पाँच घंटे प्रतीक्षा करता है और संचालक की काल्पनिक कहानियों का पात्र भी बनता है ।
मसनद पर बैठा कवि पहले ही आरामदायक पोज़ की मेहनत में जूझ रहा होता है और संचालक उसे काल्पनिक किस्से के बहाने मसलता रहता है । कवि भी अपनी दंत पंक्ति को जबरदस्ती बाहर निकाल कर अंदर ही अंदर भिन्नाते हुए अपनी बारी का इंतजार करता है,“बेटे मेरा नंबर आने दे फिर बताता हूँ।” कवि का नंबर आता है,वो बदला लेने का विफल प्रयास करता है, संचालकनुमा रेफरी उसे सफल नही होने देता क्योंकि ड्राइविंग स्कूल के ड्राइवर  की तरह ब्रेक अर्थात एक माइक संचालक जी के पास हमेशा होती है जिससे वो बीच-बीच में कवि के लिए वाह-वाह, बहुत सुंदर, या कृपया समय सीमा का ध्यान रखें कहते हुए उसे अहसास दिलाता रहता है कि बेटा असली ड्राइवर अपुन है।
जिन लोगों को बचपन से ही ज्यादा बोलने पर डाँट पड़ती हो वे कवि सम्मेलन या किसी भी साहित्यिक कार्यक्रम के संचालन के क्षेत्र में अपना करियर बना सकते हैं क्योंकि इस फील्ड में बकैती ही सबसे बड़ी योग्यता होती है । संचालक कवि नहीं होता ना ही उसके पास अपनी लिखी कविता होती है । वो संबंध बनाने में माहिर होता है बल्कि वही सबसे बड़ा मार्केटिंग गुरु होता है सो कार्यक्रम लाने से लेकर कार्यक्रम करवाने तक का जिम्मा उसी के कंधों पर होता है । यही वो इंसान है जो ख़ालिस जुबान की खाता है अर्थात बातों की खाता है । दिमाग वालों को ये चलाता है ।
किसी जमाने में मंच संचालक अलग काम था और कवि होना अलग । आज काव्य की दुनिया में संचालक होना ही मोक्ष की प्राप्ति है। बड़े-बड़े कवि भी इसी शर्त पर आना स्वीकार करते हैं कि उन्हें संचालक बनाया जाए । उसके बाद मंच से कविता बेचारी तो चुपके से नीचे उतर जाती है और वहाँ जो शेष रह जाता है वो है… संचालक का पांडित्य प्रदर्शन ,कुछ चुटकुले ,कुछ कवि कहे जाने वाले प्राणी और थोड़ा सा ग्लैमर !

अर्चना चतुर्वेदी

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