‘व्यंग्य का एपिसेंटर’ से

  • दुःख का संगीत हमेशा अवरोह से शुरू होकर आरोह पर समाप्त होता है। रुदन जब नाभि की जड़ से निकले तो समझ जाइएगा कि कोई अपना ही प्यारा हुआ है।
  • आजकल डॉक्टर और सैलून, दो ही जगह तो लंबी भीड़ होती है। एक अंदर का ट्रीटमेंट करता है और एक बाहर का।
  • आक्षेप लगाना किसी मुश्किल का हल नहीं।
  • बेहोश राजा का होशियार मंत्रालय खदानों से सोना निकालने में व्यस्त रहता है।
  • त्राहिमाम जनता की आवाज़ तब सुनी जाती है, जब राज्य में आई महामारी का प्रकोप उस कुर्सी तक पहुँच कर उसके घरौंदे को तहस-नहस करने प्रवेश कर जाता है।
  • संवाद का समय खत्म हो चुकने के बाद केवल वाद-विवाद और अपवादों का दौर चल पड़ता है।
  • हाल कुछ राजा का ऐसा है कि जनता से ही माँगता है, और जैसे ही जनता कुछ कहती है वह चुप्पी साध लेता है।
  • उगलवाने वालों को निगलने कि आदत नहीं होती। वे केवल अपना थूक गटकते हैं।
  • नेता तो नेता है। चाहे किसी भी लेवल के हों, खुद को उस गली का प्रधान और मंत्री ज़रूर मानते हैं।
  • मनुष्य की अपेक्षा पैसों का मोल ज़्यादा होता है।
  • जेब भरी हो तो तब इज्ज़त भी मुजरा करती है।
  • विद्रोह का स्वर जब सरगम के ‘सा’ पर होता है, वहीं उसकी नसबंदी करने के लिए उनकी जरूरतों की लिस्ट तैयार कर स्पॉन्सर को भेज दी जाती है जिससे वो स्वर केवल हरिभजन में दबा रहे।
  • मशीन में आलू डालकर सोना निकलने लगता तो गरीब की थाली में बचता ही क्या?
  • आपसदारी की चुप्पी आपसी समझौते की निशानी है।
  • त्याग किसी डेबिट अकाउंट जैसा नहीं बल्कि करेंट अकाउंट जैसा होता है। जितना त्याग करोगे, उससे ज़्यादा मिलेग।
  • अपने देश को गंदा करने वाले लोग, विदेश की साफ सफाई मे नपातुला योगदान देते हैं। मगर अपने देश की सफाई में नपे-तुले का भी योगदान नहीं होता, क्योंकि अपने देश मे किया गया दान, योग बनकर किसी और लॉकरों को समृद्ध करता है।
  • हमारे सर्वप्रिय व्यंजन खिचड़ी की रेसिपी को हमने अपने गायन, वादन, नृत्य आदि में उपयोग करने का भरसक प्रयास किया है।
  • हमारी संस्कृति हमें भाई-भतीजावाद से परे रखती है। इसलिए हम मारने से पहले न उम्र देखते हैं, न ओहदा और न ही संबंध। हमारा हाथ किसी के लिए भी और किसी पर भी उठ सकता है।
  • हम अपनी जवानी जवानों के रूप में बर्बाद नहीं करना चाहते है। उसके लिए हमने मॉब लिंचिंग का रास्ता खोज निकाला है। हमने उसमें विश्वास पैदा किया है। न्याय करने का सबसे आसान तरीका हमें मिल गया है। जो हमें खरीदने की क्षमता रखता है, हम भीड़ समेत उसके दरवाजे पे हाजिर हो जाते हैं।

•  अभिषेक अवस्थी

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