रंग डारो ना कान्हा मोहे आज
दूंगी भर भर गारी रे
काहे मारी भर पिचकारी
भीग गई मोरी अंगिया सारी
मोरा भीग गया सब श्रंगार
ज़ालिम वनवारी रे
मैं तो रंग गई सारी रे
कैसी रार तूने ठानी रे
कन्हैया
लूंगी ना अब मैं तोहरी
बलैया..
तेरी बातों में ना आएगी ये
नार…
काहे करे जोरा-जोरी रे
कल तो फोरी मटकी हमारी
निरख रहे ब्रज के नर-नारी
आज रंग डारी सारी रे
कन्हैया तूने कैसी की
मनमानी रे …
तू तो भयो कान्हा
श्याम रंग को
मैं हूंँ चटक चांदनी नार
जमे ना जोड़ी हमार
कर ले जतन भरमार
चले ना तेरी कोई भी चाल
रंग ना डालो मोहे आज
कन्हैया तूने कैसी ठानी रे।
निरुपमा सिंह ढाका, बिजनौर उप्र
