होरी राम सिया की

१.

सरयू तट सुंदर ‌खेल रहे मनमोहक हैं सखि राम लला।

पट पीत सजे प्रभु देह लली मुख कांति लगे जनु कोटि कला।

सुध खोकर ताक रहा रवि भी कब साँझ भई दिन डूब चला।

ढलते रवि ने कुछ सोच तभी निज रंग सखी प्रभु गाल मला।।

२.

निकसी गृह से सुकुमार सिया, उनके सँग शोभित थीं सखियाँ।

मिथिला बिटिया रँग डाल रही, मन मोह गई उनकी बतियाँ।

रँग खेलत साँझ भई जबही, तब आकुल सी लगतीं अखियाँ।

फगुआ हर रूप सिया सजतीं, चरणों लिपटीं मिथिला गलियांँ।।

शर्मिला चौहान

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