स्त्रियाँ


१.
वे मीलों सफ़र
तय कर आती हैं
मौसमों के सभी रंग
चुनरी में भर लाती हैं

वे अपने हिस्से की
जमीन पर
रख देती हैं
एक-एक टुकड़ा
आसमान का
और चुनकर रंग
बिखेर देती हैं
उन टुकड़ों पर ।

वे निराकार देह
के रिश्ते
बखूबी गढ़ती हैं
और शरारती चिकुटी संग
सौंप देती है उन्हें
एक-दूजे को ।

तब बिखर जाती है लाज
दहके अनारों की मानिंद
उन सभी के गालों पर
और
खिलखिलाहट का केसर
महका देता है
उस दालान को
जहाँ मिल बैठ
वे कुँवारी सखियां
बतियाती हैं।

२.
पंछियों की मानिंद
कैद-सी दिखाई पड़ती स्त्रियां
जानती हैं
उड़ान भरना

बाबुल की दहलीज़ लांघ
नई दहलीज़ के भीतर
ले आती हैं संग अपने
पंख बटोरकर संदूक में

जाया नहीं होने देती
स्त्रियां इन्हें
मिलने पर बाल सखियों संग
बिखेर लेती हैं
सब पंख अपने

एक उन्मुक्त
उड़ान भर आती हैं
और भर लाती हैं
पंखों में अपने
बीते समय के टुकड़े
और बाबुल की दहलीज़ की मिट्टी

नई उम्मीदों संग
फिर गढ़ लेती हैं
मर्यादाएं स्त्रीत्व की

तब भाल पर बिंदिया
व माथे पर सिंदूर
लगी स्त्रियां और
दमकने लगती हैं।

सुधीर महाजन

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