फ़ेसबुक पर एक अधेड़ कवि को सुबह से दिल टूटने वाली शायरी चेपते देखकर अपनी खोपड़ी घूमी। मन के आसमान में प्रश्नों के बादल घुमड़ने लगे “आखिर माजरा क्या है ? फिर एक इंटेलिजेंस वाला प्रश्न भी आया- ये एक भारतीय पति है, अपनी पर्सनल पत्नी के लिए इतना प्रेम सार्वजनिक रूप से तो नहीं दर्शाएगा, वो भी इस अधेड़ उम्र में, फिर भीतर छुपी टिपिकल भारतीय महिला बोली ‘जरूर दाल में कुछ काला है’।
इधर हमारे मन में एक के बाद एक प्रश्न छलांग लगा रहे थे उधर कवि जी लगातार एक एक के बाद एक दर्द भरी शायरी और कविताएं पोस्ट किये जा रहे थे । उनकी मित्र सूची के खलिहर तारीफ़ों के पुल बांधने में मगन थे सो हर शायरी पर वाह! वाह! बहुत खूब, जैसे कमेन्ट किए जा रहे थे। ये सब देखकर एक व्यंग्यकार की खुपड़िया जासूसी पर निकल पड़ी। अभी जासूस जी ने काम शुरू ही किया था कि एक कवयित्री जी की वाल पर भी कवि जी की तरह ही दर्द भारी शायरी और कविताओं का सागर हिलोरे मारता दिखा। हमारे अंदर के जासूस ने तुरंत अपनी जेब से मेगनिफ़ाइंग ग्लास अर्थात सूक्ष्मदर्शी यंत्र निकाला और बारीकी से जांच शुरू की तो मामला पूरी तरह साफ हो गया।
जिस दिन से कवि जी अपनी किसी प्रेमिका की याद में अपने दिल का दर्द इस कदर उड़ेल रहे थे। उसी दिन से वे मुहतरमा भी हर शायरी का जबाव दुगुने दर्द से ही दे रही थी।
दो दिन तक दोनों तरफ से दर्द भरे नगमों के वारों से फ़ेसबुक आंसुओं से भीग चुका था। पता लगा जब आपस में कुछ अनबन हो तो दोनों इसी तरह अपना अपना दर्द बयान करते हैं। पत्रों का जमाना हुआ पुराना और फ़ेसबुक पोस्ट के जरिए भावों का यूं आदान प्रदान देख हम भावनाओं बहने लगे थे। अभी हम उनके दर्द को समझ दर्द के सागर में डुबना शुरू ही हुए थे कि अचानक दोनों तरफ से फिर प्यार के फूल खिलने लगे शायद नाराजगी दूर ही गई थी और अब प्रेम का इजहार देख लैला मजनूँ टाइप जोड़े भी फीके लगने लगे थे। दोनों तरफ से प्यार की कसमें खाई जा रही थी।
उन शेरों शायरी यों को पढ़कर मामला एकदम साफ हो चुका था पर तह तक जाना जरूरी था सो कुछ लोगों से वार्तालाप करके आखिर हम तह तक पहुँच ही गए। वे दोनों कई वर्षों से प्रेम के सागर में गोते लगा रहे थे। ये बात और है कि दोनों बाल बच्चे दायर और शादीशुदा थे पर वो सब अलग मैटर है। एकदूसरे के प्रेम में वो 16 वर्ष के बने बस अपनी ही दुनिया में मगन थे। कोई झगड़ा होता है तो दर्द भरी शायरी पर फ़ेसबुक पर चेपते हैं और स्टेटस पर भी दिल का दर्द बयां करते हैं। आपस में बातचीत बंद है पर दिल का हाल लगातार पहुंचाया जाता है। जिन मित्रों को पता है वे आनंद लेते हैं। दो चार दिन दूरी, विरह, दर्द के गीत गुनगुनाए जाते हैं फिर दोबारा प्रेम और प्यार भरे गीत आने लगते हैं लोग समझ जाते हैं कि मिलन हो गया है, नाराजगी खत्म हो गई है। खेल तमाशा खत्म चलो घर।
वैसे देखा जाए तो इश्क की लत किसी भी नशे से ऊपर है। एक बार लग जाए तो किसी सुधार गृह में नहीं उतर सकता।प्रेम की दुनिया किसी स्वप्न से कम नहीं होती। कभी प्यार मनुहार तो कभी झगडे और रूठने मनाने का खेल चलता है।
आजकल मोबाइल युग ने आशिकों का रास्ता आसान कर दिया है, अब जब मोबाइल क्रांति ने सब कुछ आसन कर दिया है तो आशिकी क्यों पीछे रहे …भई आजकल तो ई-आशिकी का जमाना है… आज कहाँ वो अहसास? जब एक दूसरे को देख कर ही धडकनें तेज हो जाती थी। वाट्सएप, फेसबुक के जरिये आसानी से बात कर सकते हैं। आसानी से वीडियो चैट के जरिये एक दूसरे को जब मर्जी ताड़ सकते हैं। अब कहाँ वो वाली बात जब छिप छिप कर चिट्ठियां पढ़ी जाती; एक झलक पाने के लिए इन्तजार किये जाते; हमारे ज़माने में तो आशिकी फुल टाइम काम था। जिस लड़की पर नजर होती उसकी गलियों के चक्कर काटने पड़ते। कब स्कूल जायेगी, कब ट्यूशन और कब नानी के घर या कहीं और आशिक जी पूरी मुस्तैदी से तैनात रहते और उसके पीछे पीछे चलकर गंतव्य तक पहुंचा कर आते। उस वक्त के आशिकों कि खास बात ये थी कि वे गंदे कमेन्ट या कोई छेड़छाड़ नहीं करते थे। सिर्फ पीछे पीछे चलते या सामने से क्रोस कर जाते, एक नजर देखने के लिए घंटो इन्तजार करते; सबसे मजेदार बात यह थी कि पूरे ग्रुप कि लड़कियों को पता होता कौन सा लड़का किस लड़की के लिए चक्कर मार रहा है।पता लड़की को भी होता और वो कनखियों से देख निकल जाती। जिस दिन आशिक नहीं आता उस दिन लड़की नजरें सिर्फ उसे ही तलाशती और जब नजर आता तब जो ख़ुशी होती वो कोई शब्दों से बयां नहीं कर सकता। क्या आज के आशिक में इतना सब्र है? आज तो एक ना पर तेजाब डाल दे लड़की के मुंह पर उस लड़की के मुहँ पर जिसे प्यार करते थे; ये कैसा प्यार ? और हमारे ज़माने में सिर्फ अहसास भर काफी था पाना चाहत नहीं थी। वाह रे डिजिटल युग का इश्क!
अर्चना चतुर्वेदी
