सोशल मीडिया के जमाने ने बीमारी प्रमाणीकरण के पैमाने बदल कर रख दिए है। स्कूल के दिनों को याद करते हुए सोचता हूं कि उस समय जब हम बीमार होते थे तो किसी चिकित्सक से मेडिकल सर्टिफिकेट बनवा कर जमा करवाना पड़ता था। यह मेडिकल सर्टिफिकेट ही हमारी बीमारी को बीमारी सिद्ध करता था और छुट्टियों में राहत प्रदान करवाता था। अब समय बदल सा गया है, अब यदि कोई बीमार होता है तो बीमारी को सोशल मीडिया की स्वीकृति मिलना अनिवार्य हो गई है। डॉक्टर के पर्चे और पैथालॉजी लैब की रिपोर्ट्स से अधिक सोशल मीडिया की दुनिया का प्रमाणीकरण ही मेडिकल सर्टिफिकेट की भूमिका निभाता है।
आज उन्होंने अपनी मुस्कुराती हुई तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की, जिसमें उनके चेहरे पर चमक नजर आ रही थी। तस्वीर के वर्णन में लिखा था तबियत कई दिनों से खराब होने के चलते बाहर आना जाना बंद सा हो गया है। सोशल मीडिया समाज चेहरे के नूर पर ऐसा लपका जैसा कोई भंवरा फूल की ओर आकर्षित होता है। पहली ही टिप्पणी थी, आप तो बीमार ही नहीं लगती। दूसरी, आप तो मुस्कुरा रहे हो आपको बीमार कैसे मान लें? तीसरे शूरवीर ने पहले दो की बातों को पीछे छोड़ एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा आप तो रीच बढ़ाने के लिए अटेंशन लेना चाह रहे हो। इन सबकी माने तो बीमार होने से अधिक बीमार दिखना जरूरी है।
जो काम कल तक डॉक्टर की दवाई करती थी, जांच की रिपोर्ट्स करती थी, अब वो काम सोशल मीडिया ने अपने जिम्मे ले लिया है। सोशल मीडिया मेडिकल सर्टिफिकेट देने का काम शुरू कर चुकी है। उनके अनुसार बीमार कौन है? तो बीमार वह व्यक्ति है जो हाथों में ड्रिप लगी तस्वीर साझा करता है, जिसमें दुख भरा गीत लगा होता है। बीमारी जब तक प्रदर्शन न बने तब तक समाज की वर्चुअल संवेदनाएं जाग्रत नहीं होती। अब कोई जो बीमारी का प्रदर्शन करने से चूक जाए तो उसको बीमार नहीं माना जाता भले उसने दवाई और जांच में हजारों रुपए फूंक दिए हो। सोशल मीडिया उस सास की भूमिका में आ गया है जिसे अपनी बहू ड्रामेबाज लगती है। कोई मुस्कुराता इंसान कल खुद को बीमार बताए और अगले दिन किसी आयोजन में दिख जाए तो सोशल मीडिया समाज उसे नौटंकी बाज बताने से नहीं चूकता।
बीमारी को लेकर समाज में एक मानदंड स्थापित किया हुआ है, जो बीमार होगा वह दर्द से कराहाते हुए नजर आएगा। उसके घर में उदासीनता पसरी होगी। आंखों के नीचे आंसुओं के खारेपन की परत जमी होगी। उसका व्हाट्स अप स्टेट्स पीड़ा की कविताओं की रेल चला देगा तभी जाकर वो बीमार साबित होगा।ऐसे में सोशल मीडिया पर बीमार के दो वर्ग नजर आते हैं, पहले वे जो बीमार तो होते हैं मगर बीमारी का प्रदर्शन नहीं कर पाते। और दूसरे वे जो बीमार होते ही प्रदर्शन की मैराथन में दौड़ पड़ते हैं। उनके फीलिंग सिक जैसी पोस्ट को 100 लाइक्स आ जाते हैं, हद तो तब होती जब इस स्टेट्स पर लव रिएक्ट किया जाता है मानो दुनिया शर्मा जी के बीमार होने से भी प्रेम करती हो। इतना ही नहीं लोग इनबॉक्स में आकर एलोपैथी, होम्योपैथी से लेकर आयुर्वेद तक के इलाज बताने लग जाते हैं। यदि कोई इंसान बीमारी का स्टेट्स लगाए बगैर ही दुनिया से रुखसत हो लें, तो लोग कहते हैं अच्छा आदमी था, फेसबुक पर पोस्ट डाले बिना ही दुनिया से चला गया.. गेट वेल सून की हमारी कमेंट धरी की धरी रह गई। बस बीमा कंपनी का भला हो कि मेडिक्लेम में सोशल मीडिया पोस्ट का प्रमाण नहीं मांगते वर्ना जो इंसान बीमारी के प्रदर्शन से चूक जाता हैं वह आर्थिक बोझ के तले दब कर ही दम तोड देता।
अब यहां दर्द का ढिंढोरा पीटते रहो तो दुनिया बाहर से सांत्वना देती है, मगर भीतर से खुश हो रही होती है। इसके विपरित यदि खुद के दर्द को भीतर समेट कर बाहर से खुश रहो तो यह दुनिया को दुखी कर जाता है। इसी दिन के लिए लता दीदी दशकों पूर्व यह गीत सुना चुकी थी, “किसी को हँसता न देख पाए बड़ी शय है ये बैरी दुनिया..”
डॉ.सौरभ जैन
