भाईसाहब का ट्रैक रेकॉर्ड सदैव एक सा रहा। हार-जीत से परे। न दीन की चिंता, न दुनिया की फिक्र। उधर चुनाव समाप्त, इधर वे बिस्तर को प्राप्त। सदैव समान। दल भले ही हवा देख बदल दें, मगर दिल कभी नहीं बदला उनका। मसलन, धोखा देना है, तो देना है। बात खत्म! चुनाव निपटते ही वे कोविड-समय के तत्कालीन ऑक्सिजन सिलिंडर हो जाते हैं। रहते एक ही स्थान पर हैं। मगर पकड़ में नहीं आते। बाज़ार में उनकी मांग का लोच सदैव ज़्यादा ही रहा। अर्थात, जिसकी पकड़ में पैसा, उसकी जकड़ में भाईसाहब। राजयोग की दृष्टि उनपर है। भोग करने में कभी पीछे न रहे। जीतें या हारें, राज तो करना ही है। कच्चा तेल हैं अपने भाईसाहब। सदैव डिमांड में।
कल कुछ जुगत लगाई। भाईसाहब से मिलने पहुंचा। वे एकाकीपन का मज़ा ले रहे थे। बगल की मेज़ पर काजू-नमकीन रखा था। शरीर व विचारों को चुस्त-दुरुस्त रखने हेतु एक पेय पदार्थ भी रखा था। वे कुछ लिख रहे थे। संभवतः कोई गहराई की बात। जैसे कोई बड़ा लेखक ध्यानमग्न हो लिखता है। वातावरण ठंडा था। शांति इतनी गहरी कि मैं डूबा जा रहा था। लगा कहीं मेरे कान तो खराब नहीं। फिर याद आया कि मैं नेता नहीं हूँ। जान में जान आयी। मेरे आँख-कान सब बराबर कार्यरत हैं। मैंने भाईसाहब को कई आवाज़ें दीं। ट्रैक-रिकॉर्डानुसार उन्होंने जवाब देने जैसा फालतू काम नहीं किया। सवाल कितना ही गंभीर व ज़रूरी हो, भाईसाहब टस से मस न हुए। न होंगे। बक़ौल भाईसाहब, जवाबदेही जैसे शब्दों को डिक्शनरी से हटा देना चाहिए। इससे न सिर्फ डिक्शनरी की मोटाई व दाम कम होंगे, बल्कि जन-सेवकों का तनाव भी कम होगा। जवाब न देना, चुप्पी साधने में अडिग रहना, दूजे की न सुनना और अपनी ही कहना ही तो न्यू नॉर्मल है। मैंने फिर भी उनसे पूछा कि वे क्यों लिख रहे हैं? एआई का ज़माना है। नकल करना बहुत आसान है। यह सुनते ही वे ठिठके। कुर्सी को आराम दिया। उठे। दहाड़कर हँसे। मुझे इतिहास के कुछ किस्से याद आने लगे। जब बड़ा आदमी दहाड़कर हँसे, छोटे आदमी को दहाड़े मारकर रोना चाहिए। मैं ठहरा अदना सा मास्टर। इससे पहले कि वे मुझे रुलाएँ, मैंने मोमिन के शेर को सामने रखा, “ख़ामोशी देखकर दिल ज़िंदगी से हट गया होता। अगर तुम हँस न देते तो कलेजा फट गया होता।।” भाईसाहब खुश।
अब बातचीत शुरू हुई। उन्होंने मुद्दे पे आने को कहा। मैंने कहा, ‘एक अरसा हुआ आपसे मिले हुए। तो चला आया।’ वे हँसते हुए बोले, ‘रे फालतू आदमी….’ फिर हँस दिए। वापस कुर्सी पे जम गए। उनकी बिरादारी में कुर्सी सीमित क्षणों से अधिक खाली नहीं रहनी चाहिए। वरना कुर्सी पर लगा तख़्त पलट जाता है। वे कलम को अपने शिकंजे में लेने ही वाले थे कि मैंने पूछा, ‘क्या लिख रहे हैं सरकार?’ प्रश्न का आखिरी शब्द सुनते ही उनकी बांछे खिलीं। आँखें क्यूआर कोड हुईं। स्कैन किया तो बयान आया कि मोगाम्बो खुश हुआ। अदा के साथ बोले, ‘अमा यार कुछ नहीं! मृत्यु पे कविता लिख रहा था।’ मैंने उनकी ओर देखा। देखता ही रहा। बड़े लोगों को थोड़ी देर देखते रहो तो वे खुश रहते हैं। मैं बोला, बड़ा ही गंभीर विषय चुना है आपने साहब। मृत्यु पे लिखना कभी आसान नहीं रहा। आप कमाल करने वाले हैं।’ ‘लो काजू खाओ। चाय मँगवाता हूँ।’ अपने पास रखे हुए गिलास की ओर इशारा करते हुए बोले, ‘गम तुम्हारे जैसे लोग भूलाना नहीं चाहते, इसलिए ये तो पियोगे नहीं।’ मैंने जी हुज़ूरी में सिर हिलाया। जिज्ञासावश पूछा, ’आप तो सियासती मैदान के खिलाड़ी हैं। कविता की धारा में कैसे बह गए?’
‘क्यों भई? सियासत करते हुए कई लोग कवि हुए। कई कवि भी तो कविता की धारा को सियासत के मैदान तक ले आए हैं। मैं भी कूद पड़ा। मन खुश होता है तो लिखता हूँ। बहुत खुश हुआ, तो बहुत लिखता हूँ।’ भाईसाहब बोले।
‘और जब मन दुखी होता है तब?
‘दुखी हों मेरे दुश्मन! सियासी मैदान में खेलने वाले के लिए दुखी होना फ़ाउल माना जाता है। सीधा कहें तो दुखी होना हमारे प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं होता। पाप है दुखी होना। तुम्हें तो पता है, मैं पाप नहीं करता। न ही दूसरों को यह पाप करते देख सकता हूँ। जहां कहीं दुखी व्यक्ति दिखता है, फौरन आँखें मूँद लेता हूँ। कष्ट का एहसास हो, इससे पहले ही दुख का गला घोंट देता हूँ।’
‘वाह! भाईसाहब इज़ ग्रेट!’ मैंने चापलूसी की रेल दौड़ाई। पूछा, ‘कैसे कर लेते हैं आप ये हार्डवर्क? दुख तो चारों ओर है। हर समय है। देश आपस में लड़ रहे हैं। निर्दोषों का खून बह रहा है। भीड़ है। भगदड़ है। लोग कीड़े-मकौड़ों की तरह कुचल के मर जाते हैं। रोना पीटना मचा हुआ है। प्रभु, मुझे लगता है कि आपको एक-आध बार अपनी आंखे खोलनी चाहिए। पीड़ितों के लिए कुछ करना चाहिए।’ मैं आगे कुछ कहता कि भाईसाहब ने हा…हा…हा… का ध्वनि प्रदूषण फैलाते हुए कहा, ‘यह तो किस्मत है। जहां ले जाएगी, जाना पड़ेगा। जो मिले, आशीर्वाद समझकर लेना चाहिए। मौत मिले तब भी। मुआवज़ा मिले, तब भी। तुम्हारा लहजा शिकायतनुमा लगा मुझे। संभल जाओ। वरना तुम्हारी किस्मत को किस्मत वालों की एजेंसियां बदल कर रख देंगी। देश लड़ें, तो लड़ने दो। दंगे हों, भगदड़ मचे, होने दो। किस्मत का लिखा होगा ही। इसके लिए हमारी बीरादरी को जिम्मेदार क्यों ठहराया जाता है? लड़ाई होगी, तो मौतें भी होंगी। जीवन-मृत्यु तो सब काल का लिखा हुआ है। वजह तो मात्र एक ज़रिया है। मेरी चापलूसी की ट्रेन ट्रैक से बाहर चली गयी। भाईसाहब नाराज़ हुए। वे मेरी किस्मत को इधर-उधर करते, उससे पहले ही मैं ट्रेन को कविता की पटरी पर लाया। मैंने कहा, ‘बिलकुल ठीक। खैर छोड़िए फालतू बात। आप तो अपनी कविता की कुछ पंक्तियाँ सुनाइए। भाईसाहब के मन की मुराद पूरी हुई। भाषण के लिए भीड़, और कविता के लिए श्रोता मिलने पर उन्हें सत्ता प्राप्ति की अनुभूति होती है। उन्होने ने अपनी कविता पेश की-
“मृत्यु क्या है? जीवन ही तो है/जीवन क्या है? मृत्यु ही तो है/ जीते हैं मरने के लिए/मरते हैं जीने के लिए/ मृत्यु भीड़ है, इकट्ठा होती है, फिर मार डालती है/ किसी का मर जाना, होता है मृत्यु का आना/ मृत्यु क्या है? एक मुआवज़ा भर है/ भेड़-बकरियों वाला जीवन तुम्हारा, है मृत्यु/ मृत्यु क्या है? बस एक बीमा को क्लेम करने का क्षण है/ मृत्यु ही…’ भाईसाहब की कविता पूरी होती कि मैं दहाड़े मार कर रोने लगा। वे खुश हुए कि कविता इतनी मार्मिक बन पड़ी। कहने लगे असली आनंद तो अगली चार पंक्तियों में निहित है। मैं और तेज रोया। रिरियाया, ‘नहीं भाईसाहब! इतना मर्म है कविता में कि और न सुन पाऊँगा। इतना कड़वा सच लिखा है आपने। न जाने किसके समान हैं, मगर आप बहुत महान हैं। दूर तक पहुंचेगी आपकी यह रचना। फिल्म न होने के बावजूद भी इसे ऑस्कर मिलना चाहिए। आप इस मुक़ाम पर हैं कि ज्ञानपीठ पक्का है।’
कुछ देर के बाद मैं चुप हुआ। अब भाईसाहब की आँखों में आँसू थे… खुशी के!
अभिषेक अवस्थी
