गीत: विष्णुपद छन्द

मन की तुलसी झुलस रही है,
तन की ज्वाला में!
हुलस रहा है मन विनिमज्जित,
यौवन हाला में!!

वायु प्रदूषण का हल तुलसी,
तुलसी है पावन!
प्राणवायु तन मन अनुप्राणित,
तुलसी से जीवन!

दूषित जल तुलसी से पावन,
जीवन प्याला में!
मन की तुलसी झुलस रही है,
तन की ज्वाला में!!

तन तुलसीघर में मन तुलसी,
व्याकुल किस कारण!
तन की तृष्णा मन अवशोषित,
निश्चित निर्धारण!

यौवन रस परिपक्व हुआ है,
किस मधुशाला में!
मन की तुलसी झुलस रही है,
तन की ज्वाला में!!

हृदय अवस्थित सीता तुलसी,
मर्यादित राघव!
रसिक राधिका मन आराधक,
नयनों का लाघव!

चरित राम का रचकर तुलसी,
विचरित ग्वाला में!
मन की तुलसी झुलस रही है,
तन की ज्वाला में!!

दुष्यन्त देह है चन्दन तुलसी,
दूषित दुश्चिन्तक!
मुक्त कुन्तला मन शकुन्तला,
भूषित शुभचिन्तक!

अभिशप्त देह है मन अटका,
शापित बाला में!
मन की तुलसी झुलस रही है,
तन की ज्वाला में!!

तिनका तिनका है तन तुलसी,
मनका मनका मन!
मनका मनका मन अभिखण्डित,
तिनका तिनका तन!

हृदय वेध कर गयी पिरोयी,
तुलसी माला में!
मन की तुलसी झुलस रही है,
तन की ज्वाला में!!

हुलस रहा है मन विनिमज्जित,
यौवन हाला में
_______________
अशोक व्यग्र
भोपाल।

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