स्मृति वन

मन का मंथन

अंतर्मन में जो ज्वालामुखी
लावा बन फूटता है
वही लेखनी द्वारा
कहानी कविता बन जाता है

मन का विद्रोह
ही कागज पर बिछ जाता है

जो दिखावा नहीं केवल सत्य होता है
वही रचना बन पाता है

झूठ बुनने में, चुनने में
सदियां लग जाती हैं
सच पल में बाहर आ जाता है
और सुंदर रचना बन जाता है।

घनघोर घटा

मोर चकोर जब नाच-नाच कर
अपनी छटा दिखालाता है
मन मुग्ध हो
सबके मन भा जाता है

जब घनघोर घटा छा जाती है
ठंडी हवा मंद-मंद मुस्काती है

वह अपनी सुध-बुध बिसरा
इंद्रधनुष से पंख फैला
मदमस्त नृत्य करता है
सब सतरंगी हो जाता है
जंगल में मंगल छा जाता है।

कैक्टस

मैं एक बेल की तरह हूँ
जिसे आगे बढ़ने के लिए मजबूत सहारा चाहिए
दीवार का, पेड़ का, बाँस का
सहारा नहीं मिला तो
वहीं पड़ी पड़ी सड़ गल जाऊंगी
कोई मतलब नहीं रह जाएगा उगने का
मेरे अनुभव किसी काम के नहीं
जिन्हें संजोती रही उम्र भर
बेजान शरीर
कैक्टस सा जीवन
जिस घर खाद पानी की जरूरत नहीं।

सर्व सम्पन्न

बहुत से जवाब छिपे हैं
हमारे ही आसपास
नानी-दादी की कहानियों में
पुराने साज या सामान में
अतीत के गर्भ में
ऋषि मुनियों के ग्रंथ में
गीता रामायण महाभारत में
सब प्रमाण सूत्र हैं
समुद्र के नीचे का इतिहास
चंद्रमा तक जाने का मार्ग
दूरदर्शन का विवरण या पुष्पक विमान
बस खोजने समझने की जरूरत है
प्रयासरत रहें
तो हम सर्व सम्पन्न हैं।

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परिचय- बृज गोयल

मैं सरल संवेदनशील नारी हूँ। मुझे भूमिका बनाना या लिखना नहीं आता। बस जीवन के कंकरीले, पथरीले एवं सहज अनुभवों से जो सहेजा है वही कहानी, कविता बनकर पन्नों पर रच गया है।

मेरी माँ हैं- नील मणि- उनका लिखा जो प्रकाशित होने से बच गया , वह मैं सहेज कर प्रकाशित करवा रही हूं।

घोषणा पत्र- मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित हैं। उनकी ये कवितायें अप्रकाशित, स्वरचित एवं मौलिक हैं। 

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1 Comment
Neel Mani
1 month ago

बहुत बढ़िया। धन्यवाद पूरी टीम के प्रयासों का।