डिसेबिलिटी… एक्सेसेबिलिटी…

सालों से हमारे देश ने बहुत तरक्की की है, चाहे वो कला का क्षेत्र में हो या विज्ञान का हमने पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है। ये हमारे लिए गर्व की बात है कि इस बदलाव को लाने में सभी लोगों ने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। पर प्रश्न यह है कि, क्या तरक्की के साथ-साथ हम अपनी सोच में भी बदलाव ला पाए हैं? शायद नहीं। आज भी हम एक अन्धविश्वास के साथ जी रहे हैं जो लोगों को भ्रमित कर रहा है। जैसे लोगों को यह लगता है कि दृष्टिदिव्यांग लोगों के पास कुछ अद्भुत शक्तियाँ होती हैं, जबकि सच तो यह है कि हमारे पास ऐसी कोई अद्भुत शक्ति नहीं होती। ऐसा मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि मैं स्वयं दृष्टिदिव्यांग हूँ। मैंने अपने जीवन में यह अनुभव किया है कि जब कभी मैं कहीं बाहर जाती हूँ तो लोग मुझे बड़े ही आश्चर्य से देखते हैं। उनके मन में कई सारे सवाल होते हैं जैसे मैं फोन कैसे चलाती हूँ? मैं अपने आपको तैयार कैसे करती हूँ? आदि-आदि। इसके अलावा भी ऐसी कई सारी बातें हैं जो लोग सोचते हैं। कई लोगों का तो यह भी कहना है कि एक दृष्टिदिव्यांग व्यक्ति के पास संगीत कला का भी वरदान होता है। किन्तु शायद वो लोग ये नहीं जानते कि कला ईश्वर की देन होती है हर कोई कलाकार नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता तो आज हर दृष्टिदिव्यांग व्यक्ति बॉलीवुड पर राज कर रहा होता और जहाँ तक बात है अद्भुत शक्तियों की, तो अगर हमारे पास सच में अद्भुत शक्तियां होतीं तो आज हमें अपने अधिकारों के लिए लड़ना नहीं पड़ता।

मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ कि कई बार हम में योग्यता होने के बावजूद हमसे ये प्रश्न किया जाता है कि हम काम कैसे करेंगे? हमें काम नहीं मिलता। हालाँकि ऐसा नहीं है कि हमें आगे बढ़ाने के क्षेत्र में प्रयास नहीं किया जा रहा, भारत सरकार इस क्षेत्र में यह प्रयास कर रही है कि हमें मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। किन्तु अफसोस की बात यह है कि जिस तरह से प्रयास किये जाने चाहिए उस तरह से प्रयास नहीं किये जा रहे। इसका कारण यह है कि हमने पहले ही खुद को अलग कर लिया है जिसकी वजह से हमें कई नाम दे दिये गए हैं जैसे कि दिव्यांग, डिसेबल्ड, स्पेशल चाइल्ड आदि।

आप सोचिएगा कि क्या सच में हमें इन नामों की आवश्यक्ता है?

मुझे लगता है हमें इन नामों से ज्यादा आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की जरूरत है। क्योंकि जब आप समानता या समता की बात करते हैं तो आपको सिस्टम की नींव को इस तरह रखना चाहिए ताकि सबको समान अधिकार मिले और सब लोग खुद को सामान्य समझ पाएँ। पर समस्या पता है क्या है? लोगों के मन में हमेशा से यह बैठा दिया गया है कि डिसेबबल्ड का मतलब शारिरिक या मानसिक रूप से अक्षम होना है। अगर आप मेरे नजरिये से सोचेंगे तो इसका यह मतलब बिलकुल भी नहीं होना चाहिए क्योंकि जब आप बूढ़े होते हैं तो आप शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम हो जाते हैं।

क्या तब भी आपको डिसेबिलिटी में गिना जाना चाहिए?

जवाब है बिलकुल भई नहीं क्योंकि तब आप मान लेते हैं कि यह उम्र का बढ़ना है, ऐसा होना निश्चित है। जब हम ऐसा मानते हैं तो हम इस चीज को एक आम समस्या की तरह क्यों नहीं ले सकते? अगर हम ऐसा करते हैं तो कोई हमें अलग नजरिए से नहीं देखेगा और हमारी योग्यता के आधार पर काम दिया जाएगा। हाँ पर यह ध्यान रखने की आवश्यकता है हि जिसको जिस चीज की आवश्यकता है वह उस व्यक्ति को उपलब्ध होनी चाहिए। उदहरण के लिए एक दृष्टिदिव्यांग व्यक्ति को स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर जैसे जॉज़ और एन.वि.डि.ए. की आवश्यकता पड़ती हैतो ऐसे व्यक्तियों को ये सॉफ्टनवेयर उपलब्ध कराने चाहिए।

एक बात और है जो ध्यान देने योग्य है कि जब आप इन चीजों को उपलब्ध कराते हैं तो आपको यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि उनके साथ अलग तरह का व्यवाहर न किया जाए क्योंकि वो भी आपकी तरह सामान्य हैं। किसी भी चीज को हमें शब्दों से नहीं बांधना चाहिए क्योंकि जब आप शब्दों की सीमा तय कर लेते हैं तो वो सीमित हो जाते हैं। शब्दों से अभिप्राय यह है कि डिसेबिलिटी या एक्सेसेबिलिटी जेसे शब्दों का प्रयोग हम सिर्फ उन लोगों के लिए करते हैं जो लोग किसी-न-किसी रूप में अक्षम होते हैं अगर आप शान्ति से इस संदर्भ में सोचेंगे तो आपको ऐसे कई लोग मिलेंगे जिनके पास रौशनी होने के बावजूद भी अपने फोन में बोलने वाने सॉफ्टवेयर की जरूरत पड़ती है क्योंकि वो पढ़ नहीं सकते। अब आप ही बताइए कि इस शब्द को सिर्फ डिसेबल्ड लोगों के लिए ही क्यों इस्तेमाल किया जाना चाहिए? अगर हम सब कुछ सकारात्मक रूप से सोचेंगे तो हम सब कुछ सामान्य क्यों नहीं कर पाएंगे? इसमें सबसे बड़ी भूमिका सरकार और आम नागरिकों की हो सकती है। अगर सरकार विज्ञापन छापने वाली कम्पनियों को डिसेबल्ड लोगों सकारत्मक रूप से विज्ञापन छापने को कहे तो इससे विज्ञापन छापने वाली कंपनियों को तो फायदा होगा ही साथ ही ऐसे लोगों को भी फायदा होगा जिन्हें आप मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। इन दिनों एक शब्द बहुत प्रचलित हो रहा है इनक्लूजन जिसका सीधा सा मतलब है सबको साथ लेकर चलना। अगर हम सच में इनक्लूजन चाहते हैं तो हमें खुद को सामान्य लोगों की तरह ही पेश करना होगा। क्योंकि जब आप दूसरों से उम्मीद करते हैं तो आपका भी ये दायित्व बनता है कि आप एक आम नागरिक की तरह उन लोगों की उम्मीदों पर खरे उतर पाएं जिन लोगों से आप समानता या समता की आशा करते हैं। अगर आप इस दायित्व को निभाते हैं तो न ही कोई आपको अलग समझेगा और न ही कोई यह कह पाएगा कि आपके पास कुई अद्भुत शक्ति है। बस आपको स्वयं को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना आना चाहिए।

हम यह बात इस लिए कह रहे हैं क्योंकि अधिकतर दृष्टिदिव्यांग व्यक्तियों को लगता है कि नॉन डिसेबल्ड व्यक्ति उनकी बात को नहीं समझते जब कि ऐसा नहीं है अगर आप अपने विचारों को तर्क के साथ और स्पष्ट रूप से रखते हैं तो लोग आपकी बात को समझते भी हैं और सुनते भी हैं। बिना अपने विचार रखे आप अपनी बात किसी को नहीं समझा सकते। कुल मिलाकर बात यह है कि आप में आत्मविश्वास होना चाहिए।

लेखिका: लक्ष्मी चौहान

भारत की पहली सर्टिफाइड दृष्टिदिव्यांग आर.जे. लक्ष्मी चौहान की बेबाक दास्तां
स्थान: देहरादून, उत्तराखंड
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देहरादून, उत्तराखंड की शांत वादियों से निकलकर जब एक आवाज़ रेडियो की तरंगों पर गूंजी, तो उसने न केवल लोगों का मनोरंजन किया, बल्कि सदियों से चली आ रही रूढ़ियों को भी चुनौती दी। यह आवाज़ है लक्ष्मी चौहान की।
संगीत में स्नातक लक्ष्मी आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वे भारत की पहली सर्टिफाइड विजुअली इम्पेयर्ड (दृष्टिदिव्यांग) आर.जे. हैं।
एक कुशल स्टोरीटेलर और पॉडकास्टर
लक्ष्मी खुद को केवल इस उपलब्धि तक सीमित नहीं रखतीं। वे एक कुशल स्टोरीटेलर हैं, जो अपनी कहानियों से समाज के बंद दिमागों की खिड़कियाँ खोलती हैं।
• अनुभव: ‘रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साथ बतौर पॉडकास्टर काम कर चुकी हैं।
• वर्तमान कार्य: आज वे अपना खुद का यूट्यूब चैनल चलाती हैं।

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