माँ

‘माँ’ कल्पनामय दुनिया से भिन्न यथार्थ क्षितिज के धरातल का कितना अजीब सा शब्द
शब्दों से भरी शब्दकोश जैसी किताबों में भी सर्वोच्च पद पर
है पूरी कायनात समाहित इसमें !
क्या ज़मीं क्या आसमां सब नतमस्तक है इसके सम्मुख
सिंधुओं में भी इतनी गहराई नहीं इस एक शब्द के बराबर…
धरा कम्पित-से प्रतीत होते है इस शब्द के सामने
जैसे भरी निशा में गगन में कोई चकाचौंध सौदामिनी दौड़ रही हो
आलोक में भी इतनी शक्ति नहीं है कि इस ‘माँ’ जैसे शब्द की महत्ता को समझ सके!
बड़े-बड़े शब्द इस एक शब्द के आगे वैसे ही फीके से जान पड़ते है जैसे मार्तण्ड के सम्मुख राकापति का सौंदर्य मलिन पड़ जाता है।

है नहीं कोई तुलना इस शब्द की पूर्णतः अतुलनीय
वो माँ ही है सिर्फ माँ !
जब-जब बात करती है वो मुझसे या संदेश भेजती है
तब-तब वो कहती है या लिखती है “अपना ख़्याल रखना बिट्टू!”
मैं बस एक ही उत्तर दे पाता हूं “बिल्कुल, माँ!”
वह हमेशा यह पूछती है कि खाना खाया
भले ख़ुद न खाया हो
अक्सर समय ही नहीं मिल पाता है
भूल-सा जाता हूँ उससे बात करने को भी!
पर कोशिश करता हूँ कि बात कर लूं लेकिन
वक्त समय ही नहीं देता
फिर भी मैं संदेश अक्सर भेज देता हूँ और
जब मैं पूछता हूँ -“कैसी हो मम्मा आपकी तबियत तो ठीक है न ?”
वो बस कहती है हां सब ठीक है पर सर में थोड़ा दर्द था !
दर्द दर्द होता है थोड़ा और बहुत तो विलोम है पर्याय नहीं
पर वो कैसे ये सब सहन कर जाती है – पता नहीं मैं तो अनभिज्ञ ठहरा ?
हूँ सोचता अक्सर की जाकर उससे पूछूं यह अद्भुत करिश्मा
पर पूछ नहीं पाता
क्योंकि मुझे पता है वो बताएगी नहीं।
वह माँ है जो मुझे खुश रखने के लिए अपना ग़म भी नहीं बताती
सिवाय इसलिए कि कहीं मेरे आंसू न निकल आए
जब वह नहीं भी बताती है तो मुझे पता चल जाता है
पता नहीं कैसे ? शायद… टेलीपैथी…!
आख़िर वो मेरी मम्मा है मेरा अनंत है , है वह मेरी सम्पूर्ण कायनात।
जब कभी पढ़ते वक्त उसकी याद आ जाती है तो चश्म अश्कों से डबडबा उठती हैं फिर याद आता है
कि मां ने भी आंसू बहाए है अपने लिए ही तो
बसेरे से दूर जाते वक्त चिड़िया रोई या चिड़िया का बच्चा कोई नहीं जानता ….

पता नहीं बसेरा दूर गया या परिंदे…?
जब कभी इस शहर से जाता हूँ अपने गांव
सर्वप्रथम मम्मा से ही मिलता हूँ
जब-जब उसको देखता हूं देखता ही रहता हूँ
जैसे किसी शीतल स्वच्छ स्निग्ध आईने में ख़ुद को देख रहा हूं
ऐसा प्रतीत होता है जैसे ख़ुदा ने जन्नत से भी
अधिक उदार हृदय और ममता की “रश्मि “मुझे दे दी है !
उसके साथ जब बात करता हूं भूल जाता हूं
कि वक्त कब निकल गया कुछ पता नहीं लगता
बस घड़ी की टिक – टिक आवाज़ सी गूंजती रहती है और मैं सोचता हूं काश
ये समय कुछ और भी मुहल्लत देता मां से दो चार बातें करने के लिए ….
पर वक्त वक्त है उसकी अपनी एक मर्यादा है वो किसी के लिए नहीं रुकता जो रुकते है वो रुके रह जाते है !
आज भी मैं जब बात करता हूँ मां से तो यही कहता हूँ “कैसी हो अम्मा..” उसी भाषा में उसी लहज़े में ये नहीं कि ” हाऊ आर यू मॉम” । एवरीथिंग इस ग्रेट ओर नॉट । नेवर…….इट्स नॉट पॉसिबल फॉर मी !
मैं उसी भाषा में अपनी मां से बात करता हूं।
आधुनिकता विचारों में आती है भाषा ,रहन- सहन और कपड़ों में नहीं।

उस मम्मा की आंखों के अंदर अपनी आंखों में देखता हूं
तो मुझे एक “माँ” दिखाई देती है
एक अलग भास्कर के समान तेज है उसमें
है नहीं महज़ ममता की साकार प्रतिमूर्ति ही वह अपितु वात्सल्य की पराकाष्ठा को भेद करने वाली एक सुंदरतम किरण भी है !
है उसकी बातों में एक अनोखा सा इंद्रजाल
होती है वो सामने तो लगता है पूरी कायनात है मेरे साथ
है नहीं उस मम्मा के जैसा तो स्वयं ब्रह्मांड भी विस्तृत
नहीं हो सकती तुलना उसकी किसी से भी
है वह विनम्रता की बेजोड़ सिंधु सी
है मेरे जीवन की पहली मरीचिका वो…!

है माँ मेरे लिए वह धूप जो मेरे जीवन को उजाला देती है
है मेरे जीवन की सरिता वो जो
मेरी प्यास को बुझा कर खुद पानी नहीं पीती
है मेरे लिए सुधा वो
है वो मेरे हृदय की पहली धड़कन
है वह मेरे लिए वह ब्रह्मांड की प्रथम सर्वोत्कृष्ट चित्रकारी
है वह ईश की पहली विधा-सी
है वह सभी उपन्यासों में सबसे श्रेष्ठ
कहानियों की है वह अनंत भंडार
है महाकाव्यों की एक मात्र प्रतिमा वह
है मेरे जीवन की पहली कमलिनी वो
है स्वयं वह करूणानिधान
है महान वो वक्त से भी अधिक
नहीं पा सकता वक्त स्वयं भी उसे
है मेरे लिए वह सिंधु की पहली लहर
है वह पहली गुंजार जो गूंजी थी सर्वप्रथम इस सृष्टि में !
वह सर पर हाथ फेर देती है तो हिम्मत सी मिल जाती है
वो एक बार मुस्कुरा देती है तो जन्नत मिल जाती है
ऐसा लगता है कि जैसे भरे मरूस्थल में भी मुझे जल देकर बड़ा कर रही है वो …!

अक्सर जब मेरी तबियत ख़राब हो जाती है
पता नहीं कैसे उसे पता चल जाता है ?
न कोई मैसेज न कोई बात फिर भी !
न जाने कौन सी शक्ति उसे एहसाह दिला देती है कि मेरी तबियत ख़राब है
नहीं देखें कभी भी आंसू मैंने उसकी आंखों में
सिवाय एक मुस्कान के
हो चाहे जितनी स्वयं वह उदास
पर..?
वो कैसा दिन था स्कूल का ..?
आज भी मेरी मानस पटल पर वो स्मृतियां अपनी उसी अवस्था में जागृत सी है जो उस समय थी
वो थी स्मृतियां मेरी माँ की जो है स्वयं किरण का पर्याय
उसकी आँखों से आँसुओं की धारा निकल रही थी
सिर्फ मेरे लिए ही तो ।

क्या लिखूँ उसके बारे में शब्द सीमित है पर लिखना असीमित
नहीं है अभी इतनी ताक़त मेरे कलम में
कि कुछ ख़ास लिख सकूँ उसके बारे में
बस इतना कि….
है मेरे जीवन की वो स्वयं रूद्रशक्ति
उसके होने बस से मैं ख़ुद को मुकम्मल सा मानता हूँ
इतना ही की अपने रब से पहले मैं अपनी मां को मानता हूँ
नहीं देखा कभी मैंने उसे रोते हुए
जितनी उदासी जितनी थकान हो उसके चेहरे पर
सिवाय उस दिन के
पर वो माँ का प्यार था जिसने आंसुओं का रूप इख्तियार कर लिया।

जब-जब देखता हूं चित्रों में उसे
तब-तब निकलने लगते है आँसू
हूँ बहुत दूर उससे पर
हमेशा दीवार बनी खड़ी है मेरे सम्मुख
होने ही नहीं देती है वह कोई भी परेशानी मुझे
रो लेती है अकेले में पर नहीं रोने देती है मुझे।

होने लगती है एक दिन पहले से ही निकलने की तैयारी
हो जाती है गायब उसके आँखों की नींद भी
है चाहती वो सोना
पर नींद कहाँ …?
होने लगती हैं बेचैन सी उसकी आँखें
थकान से बोझिल
पर है नहीं सोती वो
पैसे की कभी कभी जरूरत तो लगती है
मुझे पता है कि नहीं होते है उसके पास पैसे
पर मेरे लिए बचा के रखती है वो
कि जब जायेगा मेरा भैया… तब…!
नहीं खत्म करती है वह एक रुपया भी
सिर्फ़ मेरे लिए ही तो
घर से निकलते वक्त एक परिचित सी मायूसी छा जाती है
उसके चेहरे पर
फटने सा लगता है उसका दिल
वो मन ही मन तो कहती है न जा
पर जाना तो सभी को है
वह बहुत कुछ कहना चाहती है
है करना चाहती वह अनंत बातें मुझसे
शब्द भी बहुत हैं बातें भी
पर निकलता नहीं एक शब्द भी
सिवाय एक अनवरत पवित्र अश्रु धारा के
पैर कंपन से करने लगते है उसके
पूरे घर में एक अजीब सन्नाटा सा छा जाता है
घर की हर चीज़ उदास सी लगती है
रातें रोया करती हैं उस दिन
आँसू रुकते नहीं हैं दीवारों के
रोया करती है घर की पूरी आंगन
घर के बाहर गली में ख़ामोशी छा जाती है
लेकिन हमें जाना है
यह कहकर दुबारा नहीं देख पाता हूँ माँ को
रोक लेता हूँ ख़ुद को खाने की इच्छा की तरह
परन्तु…?
देखता हूं तो उसकी दोनों दृगें प्लावित हो उठती है
सोचता हूँ आते वक्त भी उसे खुश करता आऊं
पर यह करने में प्रायः असफल हो जाता हूँ….!
फ़िर…!
घर से निकलते वक्त उन लाखों रुपए की कीमत कम हो जाती है मेरे लिए जब माँ मुझसे यह कहकर मुझे सौ रुपए पकड़ा देती है कि ” भैया अगर रास्ते में भूख लगे तो कुछ लेकर खा लेना।”

नवनीत कुमार 

हिंदी विशेष, द्वितीय वर्ष,लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

Subscribe
Notify of

1 Comment
Rita Prasad
7 months ago

Bahut sundar kavita, Aashirwad aage badhte rahiye.

Last edited 7 months ago by Rita Prasad