कुलधरा: एक लोककथा

कुलधरा: एक लोककथा

बहुत पहले की बात है — जब पश्चिमी रेगिस्तान के टीलों पर चाँदनी सोने सी बिछी रहती थी और रेत का हर कण किसी प्राचीन गीत की तरह झनकता था।
वहीं, जैसलमेर के निकट, फैले हुए मरुभूमि के बीचोंबीच बसता था — कुलधरा, पालीवाल ब्राह्मणों का गाँव।

उनकी बस्तियाँ सुव्यवस्थित थीं — घर एक लय में बने हुए, हवेलियों की जालियों से छनती धूप आँगनों में पवित्र रेखाएँ खींचती थी।
हर घर में ज्ञान, संगीत, और संस्कृति की सुगंध थी।
पालीवाल लोग जल का संचय करने में माहिर थे — उन्होंने रेत में भी जल की नसें ढूँढ ली थीं।
उनके कुएँ, बावड़ियाँ और तालाब और जल निकासी के लिए नालियां, हवा के लिए खिड़कियां- झरोखे सब — विज्ञान और वास्तु के अनुरूप था।
गाँव के बीचोंबीच शीतल जल का एक विशाल कुआँ था — जिसे वे “जीवन का नाभि” कहते थे।
कुलधरा सचमुच एक जीवित सभ्यता थी — शांत, सुंदर और आत्मनिर्भर।

पर कहते हैं न, जहाँ सौंदर्य और सत्य होता है, वहाँ ईर्ष्या और अन्याय भी अपने पाँव पसारने लगते हैं।
और एक दिन, वही हुआ।

गाँव के मुखिया बेटी जो अत्यधिक रूपवती थी, उसके रंग और रूप में मोतियों सी गुलाबी आभा थी। वह मुखिया की ही नहीं, पूरे गांव बेटी थी।
साक्षात सौंदर्य की प्रतिमा। जैसे मरुधरा में चाँद उतर आया हो। उसकी आँखों में गहरा नीला आकाश था, और चाल में रेगिस्तानी नृत्य की थिरकन।
वह जब कुएँ पर पानी भरने जाती, तो उसके पायलों की झंकार से आसपास की हवा तक झूम उठती थी।

एक दिन उसी सौंदर्य पर नज़र पड़ी — जैसलमेर के दीवान सालम सिंह की।
वह क्रूर, दुष्ट और स्वार्थी व्यक्ति था —
उसने कहा — “यह लड़की मुझे चाहिए।”
आदेश दिया कि अगले पूर्णिमा तक उसे महल में पहुँचा दिया जाए।
नहीं तो पूरा गाँव राजद्रोही माना जाएगा — कर बढ़ा दिए जाएँगे, कुएँ बंद कर दिए जाएँगे, और लोग भुखमरी से मरेंगे।

कुलधरा में सनसनी फैल गई।
लोगों ने पंचायत बुलाई।
पुराने बुज़ुर्ग, युवा, महिलाएँ — सब इकट्ठा हुए।
किसी ने कहा, “हम झुक जाएँ तो जीवन बचा रहेगा।”
दूसरे ने कहा, “पर क्या वो जीवन कहलाएगा, जिसमें मान न बचे?”

मुखिया की आँखों में आँसू थे — एक पिता और एक नेता, दोनों भीतर से टूट रहे थे।
रात गहराती गई। हवा में घुटन बढ़ गई थी।
फिर चाँद बादलों में छिप गया — जैसे किसी अशुभ का संकेत हो।

उसी रात, निर्णय हुआ —
“हम अपना गाँव छोड़ देंगे, लेकिन बेटी नहीं देंगे।”

धीरे-धीरे, मशालों की टिमटिमाहट में, सबने अपनी गठरियाँ बाँधीं।
रोटियाँ अधपकी रह गईं, चूल्हों में अंगार धधकते रह गए।
कुएँ का जल आखिरी बार किसी ने माथे पर लगाया — जैसे किसी तीर्थ का आशीर्वाद हो।
फिर सब निकल पड़े — स्त्रियाँ, बच्चे, बूढ़े, जवान — ८४ गाँवों के लोगों एक साथ पलायन सहज नहीं था!
रेत में उनके कदमों के निशान और, स्वाभिमान की गूंज थी।
हवा शिथिल और उदास थी। ग्राम वासियों के आँसुओं की नमी जैसे रेत में स्थायी रूप से ठहर गई थी ।

कहते हैं, जाते-जाते उन्होंने गाँव के देवस्थान पर दीप जलाया और शपथ ली —
“अब यह गाँव कभी आबाद नहीं होगा। जो भी यहाँ बसने की कोशिश करेगा, उसे यह धरती स्वीकार नहीं करेगी।”

और सच में — भोर होने तक कुलधरा खाली हो गया।
पंछी लौटे, पर इंसान नहीं।
सूरज उगा तो हवेलियों की खिड़कियों से रेत झर रही थी, और दरवाज़ों पर लटकती झूलें हवा में हिल रही थीं।
कुएँ के जल पर राख तैर रही थी।

वर्षों बीते।
कुलधरा अब खंडहर है —
दीवारें हैं, मगर उनमें सांस नहीं।
आँगन हैं, पर उनमें बच्चों की हँसी नहीं।
मंदिर हैं, पर घंटियाँ नहीं बजतीं।
कुएँ हैं, पर उनमें सिर्फ़ प्रतिध्वनि है — उस शापित प्रतिज्ञा की।

रात के समय, जब हवा बहती है तो लगता है जैसे किसी ने धीमे से कोई नाम पुकारा हो।
कभी लगता है जैसे पायल की आवाज़ आई हो, कभी जैसे कोई दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुला हो।
कहते हैं, कुछ यात्रियों ने वहाँ दीयों की हल्की रोशनी देखी है, किसी के चलने की आहट सुनी है।
पर जब वे पास गए, तो सिर्फ़ रेत थी — और शून्य।

लोग अब भी कुलधरा को “भूतिया गाँव” कहते हैं।
पर बुज़ुर्ग कहते हैं — “वो भूत नहीं हैं, वो स्वाभिमानी आत्माएँ हैं,
जो आज तक अपनी गरिमा की रखवाली कर रही हैं।”

कुलधरा आज भी एक प्रतीक है —
उस मरुस्थली सभ्यता का,
जहाँ रेत के नीचे दबी हैं न सिर्फ़ हवेलियाँ, बल्कि सम्मान, प्रतिरोध, और मौन की गाथाएँ।

डॉ. प्रमिला शंकर

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