इक्षुमती नदी: एक पौराणिक और ऐतिहासिक धरोहर

इक्षुमती नदी एक पौराणिक नदी है जिसका उल्लेख हिंदू और बौद्ध धर्मग्रंथों में मिलता है। यह नदी सांकाश्या (वर्तमान संकिसा, फ़र्रूख़ाबाद जिले में) के पास स्थित है और इसका महत्व पौराणिक, ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टिकोण से है। इस लेख में, हम इक्षुमती नदी के महत्व, पौराणिक संदर्भ, भौगोलिक महत्व, धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता, और अन्य उल्लेखों पर चर्चा करेंगे।

प्रस्तावना

इक्षुमती नदी एक पवित्र नदी है जिसका उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी में किया गया है। यह नदी, वर्तमान ईखन है, जो उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में स्थित संकिसा के निकट बहती है। इक्षुमती नदी का महत्व पौराणिक, ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टिकोण से है, और यह नदी सांकाश्या तीर्थ के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

निरुपण

  1. पौराणिक संदर्भ

वाल्मीकि रामायण (2/69/17) के अनुसार, इक्षुमती नदी अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि वशिष्ठ ऋषि के दूतों को भरत जी को बुलाने के लिए कैकय देश जाते समय इसे पार करना पड़ा था। वाल्मीकि रामायण (2/69/17) का श्लोक इस प्रकार है:

“इक्षुमतीं चापि ततो गत्वा नदीं शुभाम् | वशिष्ठपुत्रमासाद्य भरतं वाक्यमब्रवीत् ||”

अर्थ:
“तत्पश्चात् (दूत) ने शुभा इक्षुमती नदी को पार करके वशिष्ठ के पुत्र (भरत) के पास जाकर उनसे कहा…”

यह नदी हिमालय से निकलकर कुमाऊं और रुहेलखंड क्षेत्रों से बहती हुई कन्नौज के पास गंगा नदी में मिल जाती थी [1]।

2. भौगोलिक महत्व

इक्षुमती नदी का भौगोलिक महत्व भी है। यह नदी उत्तर प्रदेश में ‘काली नदी’ के रूप में जानी जाती है और इसका उल्लेख पाणिनि के अष्टाध्यायी में भी मिलता है। महाभारत में भी कुरुक्षेत्र के निकट एक इक्षुमती नदी का वर्णन है, जहाँ तक्षक और अश्वसेन नाग रहते थे [1]।

इक्षुमती नदी का प्रवाह हिमालय से निकलकर कुमाऊं और रुहेलखंड क्षेत्रों से बहती हुई कन्नौज के पास गंगा नदी में मिल जाता था। यह नदी सांकाश्या तीर्थ के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है और यह नदी सांकाश्या क्षेत्र के जन-जीवन को प्रभावित करती है।

3. धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता

इक्षुमती नदी को अन्य पवित्र नदियों की तरह जीवनदायिनी शक्ति, पवित्रता और जनमानस की आस्था का प्रतीक माना जाता है। इसका सांकाश्या तीर्थ के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है और यह नदी सांकाश्या क्षेत्र के जन-जीवन को प्रभावित करती है।

इक्षुमती नदी के तट पर कई प्राचीन तीर्थस्थल और मंदिर हैं, जो इसकी धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता को दर्शाते हैं। यह नदी हिंदू और बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है।

4. अन्य उल्लेख

इक्षुमती नदी का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, जहाँ तक्षक और अश्वसेन नाग रहते थे। इसके अलावा, पाणिनि ने अपने ग्रंथ अष्टाध्यायी में ‘इक्षुमती’ शब्द का उल्लेख किया है, जो इसके प्राचीन अस्तित्व और महत्व को दर्शाता है [2]।

कान्यकुब्ज और पांचाल तीर्थस्थल

पाणिनी की अष्टाध्यायी में ‘कान्यकुब्ज’ और पांचाल तीर्थस्थल का उल्लेख है, जो निम्नलिखित हैं:

  • कान्यकुब्ज: यह एक महत्वपूर्ण पौराणिक स्थल है, जिसका उल्लेख अष्टाध्यायी में किया गया है। यह वर्तमान कन्नौज है, जो उत्तर प्रदेश में स्थित है। (अष्टाध्यायी 4.2.133)
  • पांचाल: यह एक महत्वपूर्ण पौराणिक स्थल है, जिसका उल्लेख अष्टाध्यायी में किया गया है। पांचाल के अंतर्गत वर्तमान उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद, बदायूं, और आसपास के क्षेत्र आते हैं। (अष्टाध्यायी 4.2.133)
  • अहिच्छत्र: यह पांचाल का एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है, जिसका उल्लेख अष्टाध्यायी में किया गया है। यह वर्तमान रामनगर है, जो उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में स्थित है। (अष्टाध्यायी 4.2.80)
  • कंपिल: यह पांचाल का एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है, जिसका उल्लेख अष्टाध्यायी में किया गया है। यह वर्तमान कंपिल है, जो उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में स्थित है। (अष्टाध्यायी 4.2.133)
  • सांकाश्य: यह पांचाल का एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है, जिसका उल्लेख अष्टाध्यायी में किया गया है। यह वर्तमान संकिसा है, जो उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में स्थित है। (अष्टाध्यायी 4.2.80) इक्षुमालिनी (काली) नदी की वर्तमान दशा

इक्षुमालिनी (काली) नदी की वर्तमान दशा बहुत चिंताजनक है। नदी का जल प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन गया है, जिससे न केवल पर्यावरण बल्कि मानव स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। औद्योगिक अपशिष्ट, घरेलू सीवेज, और कृषि रसायन नदी में मिलकर जल को दूषित कर रहे हैं [1]।

नदी की दुर्दशा के कारण:

  • औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू सीवेज का नदी में मिलना
  • कृषि रसायनों का नदी में मिलना
  • प्लास्टिक और अन्य कचरे का नदी में फेंकना
  • खनन और निर्माण कार्यों से नदी में मिट्टी और अन्य सामग्री का प्रवाह समाधान:
  • सख्त कानून और नियम बनाकर औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू सीवेज के प्रबंधन को सुनिश्चित करना
  • जन जागरूकता और शिक्षा के माध्यम से लोगों को जल प्रदूषण के खतरे के बारे में जागरूक करना
  • जैविक खेती को बढ़ावा देना और रसायनों के उपयोग को नियंत्रित करना
  • कचन के निपटान और पुनः उपयोग की उचित व्यवस्था करना
  • नदियों के आसपास सफाई अभियानों का आयोजन करना गंभीर चिंतन:
  • नदी जल प्रदूषण एक गंभीर समस्या है, जिसे केवल सरकारी या गैर-सरकारी प्रयासों से नहीं बल्कि समाज के हर वर्ग की सक्रिय भागीदारी से ही दूर किया जा सकता है।
  • हमें सभी स्तरों पर एकजुट होकर काम करना होगा ताकि नदियों की स्वच्छता और जीवन की गुणवत्ता बनाए रखी जा सके। संदर्भ :
    [1] पाणिनी की अष्टाध्यायी, 4.2.80, 4.2.133
    [2] महाभारत, आदिपर्व, 3.16-20
    [3] वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड, 69.17 निष्कर्ष

इक्षुमती नदी एक महत्वपूर्ण पौराणिक नदी है जिसका उल्लेख हिंदू और बौद्ध धर्मग्रंथों में मिलता है। यह नदी सांकाश्या तीर्थ के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है और यह नदी सांकाश्या क्षेत्र के जन-जीवन को प्रभावित करती है। इक्षुमती नदी के तट पर कई प्राचीन तीर्थस्थल और मंदिर हैं, जो इसकी धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता को दर्शाते हैं।

आलेख
डाॅ प्रखर दीक्षित
फर्रूखाबाद(उ.प्र.)

Subscribe
Notify of

3 Comments
डॉ श्याम गुप्त
6 months ago

यह नदी हिमालय से निकलकर कुमाऊं और रुहेलखंड क्षेत्रों से बहती हुई कन्नौज के पास गंगा नदी में मिल जाती थी [1]।——–फिर अयोध्या से कैकय जाते समय यह कैसे पार करनी पडेगी ——

प्रखर दीक्षित

महोदय यह नदी संकिसा के पास बहती है, जोकी अयोध्या से बहुत दूर पश्चिम में है। अयोध्या पश्चिम में चलने पर पहले कान्यकुब्ज (कन्नौज),फिर 60 कोस कन्नौज से पश्चिम दक्षिण कोण पर साकांश्या (संकिसा) साम्राज्य स्थापित था। जिसके शासक राजा सीरध्वज के अनुज कुशध्वज थे। तदुपरां शत्रुघ्न को राज मिला।
संकिसा से पश्चिमोत्तरी कोण में कैकेय देश है। अयोध्या से जाने वालों ने साकांश्या के निकट ही इक्षुमालिनी को पार किया।

प्रखर दीक्षित
6 months ago

पौराणिक विरासत इक्षुमालिनी “इक्षुमती ” को सहेजने के लिए पटल कविता जंक्शन को का आभार धन्यवाद।

पाठकों से कनौऊजी सहेजने का आवाहन है।