घूरे का हँस


अर्चना चतुर्वेदी जितनी बिंदास फेसबुक पर दिखाई देती है। उतनी ही संवेदनशील वह तब बन जाती हैं, जब उनके किताबों के विषयों का चयन या ट्रीटमेंट क़ी बात आती है। अर्चना जी को लोग एक व्यंग्यकार के रूप में जानते है और एक ऐसे इंसान के रूप में जिसने अपने लेखन और जीवन दोनों में बराबर शुचिता बरती है। वह जहाँ अपनी लेखनी से विसंगतियों से जूझती मिलती है वहीँ आपने जीवन में भी हर गलत से जूझने का माद्दा रखती हैँ। उनके मस्त और अल्हड़ मिजाज़ के कारण लोग उनसे हमेशा हास्य और व्यंग्य से भरपूर लेखन क़ी अपेक्षा करते हैँ। लेकिन इस बार उन्होंने अपने नये उपन्यास ‘घूरे का हँस’ से लोगों को चौका दिया है।

अर्चना चतुर्वेदी द्वारा लिखा गया एक मार्मिक, प्रासंगिक और विचारोत्तेजक उपन्यास है “घूरे का हंस” । जो हमारे समाज की उस सच्चाई को उजागर करता है, जिस पर आमतौर पर बात नहीं होती। वो है पुरुष की संवेदनाएँ, संघर्ष और सामाजिक अपेक्षाओं के बोझ तले दबा उसका जीवन। यह उपन्यास पुरुष विमर्श की ज़रूरत पर ज़ोर डालता है और इस विचार को मज़बूती से प्रस्तुत करता है कि “मर्द को भी दर्द होता है।”

उपन्यास की मूल भावभूमि एक साधारण पुरुष रघु के जीवन पर आधारित है। जो हर आम भारतीय पुरुष की तरह जन्म के समय तो परिवार में उल्लास का कारण बनता है, लेकिन धीरे-धीरे समाज, परिवार, कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के बोझ तले खुद को कहीं खो बैठता है। वह पिता की उम्मीदें, माँ की मर्यादाएँ, बहन की शादी की चिंता, और समाज की परंपराएँ ढोता चला जाता है, बिना कोई शिकायत किए। वो इस उपन्यास के माध्यम से यह दर्शाना चाहती हैं कि, जिस पुरुष को समाज अक्सर कठोर हृदय और भावनाविहीन समझता है, वह भी टूटता है, वह भी प्रेम करता है, और त्याग करता है।

उन्होंने भाषा को अत्यंत सरल, संवादात्मक और संवेदनशील रखा है। रघु के विचार, संवाद और संघर्षों को जिस सहजता से पिरोया गया है। वह पाठक को उसकी दुनिया में ले जाता है। संवादों में गहराई है, पात्रों की विश्वसनीयता बरकरार रहती है और हर परिस्थिति मानवीय लगती है। कई जगहों पर व्यंग्यात्मक शैली भी देखने को मिलती है, जिससे पाठक को सामाजिक ताने-बाने पर सोचने को मजबूर होना पड़ता है।

‘घूरे का हँस’ शीर्षक अपने आप में प्रतीकात्मक है। एक ऐसा व्यक्ति जो समाज की गंदगी, अपेक्षाएँ, तानों और उपेक्षाओं के ढेर में भी मुस्कुराना नहीं छोड़ता। यह उपन्यास पुरुष पात्रों को केवल “सत्ताधारी” या “उत्पीड़क” के रूप में देखने के दृष्टिकोण पर प्रहार करता है और एक नई दृष्टि विकसित करने का प्रयास करता है। जहाँ पुरुष भी शोषण का शिकार हो सकते हैं।

उपन्यास में माँ की सामाजिक सोच, बहन की आत्मनिर्भरता के प्रति संघर्ष, और रघु की मानसिक अवस्था को बहुत खूबसूरती से उकेरा गया है। विशेष रूप से रघु का अपनी माँ से तर्क और बहन की नौकरी को लेकर किया गया संघर्ष। इस बात की मिसाल है कि पुरुष सिर्फ निर्णय लेने वाला नहीं, बल्कि बदलाव का वाहक भी हो सकता है।

‘घूरे का हँस’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज है जो पुरुषों की मनोस्थिति, दबाव और बलिदान को समाज के सामने लाता है। यह उन अनकही कहानियों को आवाज़ देता है जो अब तक स्त्री विमर्श की गूँज में दब चुकी थीं। यह उपन्यास एक संतुलित समाज की ओर इशारा करता है। जहाँ स्त्री और पुरुष दोनों के दर्द को बराबरी से सुना और समझा जाए।


यह कृति हर उस पाठक को पढ़नी चाहिए जो समाज की नई परिभाषाएँ गढ़ने में रुचि रखता है और मानता है कि सहानुभूति केवल स्त्रियों के लिए नहीं, पुरुषों के लिए भी ज़रूरी है।


अलंकार रस्तोगी

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