नारी मन की गिरहों को खोलता, ‘मुक्ति पत्र’ ; डॉ. अंजू
एक स्त्री जब कलम उठाती है तो स्वाभाविक रूप से नारी जीवन के विविध मनोभावों का अंकन उसकी लेखनी से निःसृत होकर सजीव हो उठता है। नारी मन की गिरहें खोलती 12 कहानियों से सजा डॉ. अंजू का प्रथम कहानी संग्रह ‘मुक्ति-पत्र’ कथा-साहित्य की दुनिया में राजस्थानी ग्रामीण अंचल की सोंधी महक लिए हुए आया है। इस यात्रा के प्रथम पड़ाव के रूप में शीर्षक कहानी ‘मुक्ति पत्र’ नायिका मिथिलेश की पीड़ा को स्वर देती है। वे पाठक के हृदय को सम्वेदना के गहन सागर में डुबाती हैं, किंतु कहानी के अंत में मुक्ति-पत्र पर हस्ताक्षर करवाकर उन्हें इस पीड़ा से उबार भी लेती हैं। नायिका की दृढ़ता अंत में नारी-जीवन की विडम्बनाओं से मुक्ति हेतु हस्ताक्षर कर स्वयं को उन बेड़ियों से आजाद कर लेती है, जो सदियों से समाज ने स्त्री-मन पर बांध दी हैं। इन पंक्तियों में व्यक्त भाव उसी मुक्ति की घोषणा करते हैं-“ यह पेपर्स मेरे लिए बेजान रिश्ते और बच्चों के लिए अपनी मम्मी जी की रात-दिन की घुटनभरी मौत से मुक्ति के पत्र पर हस्ताक्षर थे।“
‘पुरजे’ कहानी में दरकते सम्बन्धों के टूटने की गूंज शब्दों के पहाडों से टकराकर देर तक पाठक हृदय को विचलित करती है। इन पंक्तियों में प्रकृति के उपादानों को लेखिका ने मानो नायिका की पीड़ा का सहभागी बना दिया है – “ रह-रह बिखरे बादलों के आवारा झूंड से घिरी निपट अकेली शाम की गमगीन उदासी को हवा दे रहे हैं। बीच-बीच में खामोशी से चमकती बिजलियाँ बादलों को छोड़ आज उसके दिल में उतर आई हैं।
‘सौदा’ कहानी एक गरीब और हालात के आगे विवश सरोगेट मदर की पीड़ा को बयान करती कहानी है। लेखिका की भाषा दर्द की स्याही में डूबकर इस पीड़ा को अभिव्यक्ति प्रदान करती है। ‘शांति बाई’ कहानी में लेखिका राजस्थान के ग्रामीण परिवेश में ले जाती हैं, जहाँ शांति बाई की संघर्ष-गाथा के साथ राजस्थान के ग्राम्य-जीवन की झलक और राजस्थानी भाषा की मिठास दोनों हैं। डॉ. अंजू ने कहानी की मौलिकता बनाए रखने के लिए आंचलिक भाषा का प्रयोग किया है, जो उनके अपने परिवेश से गहन लगाव का परिचायक है। ‘जीत’ कहानी में समाज में एक सास का अपने बेटे के विरुद्ध जाकर बहू का साथ देना एक नये समाज के निर्माण की आश्वस्ति देता है, जहाँ सास अपनी बहू का न सिर्फ साथ देती है वरन् उसे आगे बढ़ाने के लिए भी प्रयासरत है।
‘माँ’ कहानी में माँ की ममता और ‘बाबा निमिया के पेड़’ कहानी में एक बेटी की मायके से जुड़ी यादों की सैर कराती हैं। ‘परदेसी’ कहानी कोरोना महामारी और लॉअडाउन जैसी परिस्थिति की भयावहता के बीच विदेश में फँसे बेटे की विवशता दर्शाती है, जो अपनी माँ के अंतिम संस्कार में शामिल न हो सका।
‘तीज त्योहारा ले बा’वडी’ कहानी वर्तमान संदर्भों में कामकाजी पति-पत्नी के मध्य अहम् के टकराव से टूटते परिवार को बचाने की पहल करती एक बहन के प्रयासों की सुखद यात्रा है। लेखिका की सम्वेदना मानवीयब सम्बंधों से इतर जानवरों तक पहुंचती है और ‘दुर्गा’ कहानी में पालतू गाय दुर्गा का परिवार के साथ सम्बंध और बछडे की निर्मम हत्या पर उसकी पीड़ा मानो डॉ. अंजू के शब्दों में साकार हो पाठकों के हृदय को विगलित कर देती है।
‘परतें’ कहानी में मानवीय सम्बंधों के बीच की परतों को हटाने का प्रयास किया गया है तो अंतिम कहानी ‘बोल मुनि राम-राम में’ नेहा का एक गलत रिश्ते से मुक्ति की घोषणा के साथ पुस्तक के अंतिम पंक्तियां पुनः मुक्ति पत्र पर हस्ताक्षर सी प्रतीत होती है ‘बरसों की यंत्रणाओं को झेलने के बाद आज उसका मौन टूट गया था। मंदिरों में संध्या के समय बजती घंटियों के साथ सरोज के बोल मुनि राम-राम की आवाज उसे जीवन रस से आप्लावित किए जा रही थी। डॉ.अंजू ने ‘मुक्ति पत्र’ के जरिए हिंदी कथा साहित्य जगत में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज की है। राजस्थानी परिवेश की महक लिए यह कथा संग्रह इंडिया नेट बुक्स द्वारा प्रकाशित हुआ है।
मुक्ति पत्र (कहानी संग्रह) लेखिका – डॉ. अंजू प्रकाशन वर्ष : 2022 मूल्य : 250/ प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड
समीक्षक
डॉ.अन्नपूर्णा सिसोदिया

अन्नपूर्णा जीजा होकम और कविता जंक्शन का हृदय की अतल गहराइयों से आभार।
आपने मेरे ‘ मुक्ति-पत्र ‘ कहानी – संग्रह के प्रत्येक पक्ष का सूक्ष्म विश्लेषण कर सारगर्भित समीक्षा की है। पुनः आभार। 🌹🌹💕❣️🌹🌹🙏🌸🌸🌹🌹