गोर वरण री गोरड़ी, ऊभी निरखै हाथ।
पीव अमीणौ आवसी, चुड़लौ लासी साथ।।1।।
शब्दार्थ-गोर वरण – गोरे रंग की , गोरड़ी – पत्नी , प्रियतमा,सजनी , मेहबूबा , ऊभी – खड़ी ,निरखै – निहार रही ,देख रही , पीव- पति, साजन, प्रियतम, महबूब, अमीणौ – मेरा, आवसी- आएंगे,आ जाएगा, चुडलौ – हाथों में पहनी जाने वाली राजपूती चुडियां , लासी – लेकर आएंगे , लाएंगे।
भावार्थ – गोरे वर्ण की प्रियतमा खड़ी खड़ी अपने हाथों को निहारते हुए कह रही है मेरे प्रियतम जब आएंगे अपने साथ मेरे लिए चुड़िया लेकर आएंगे।।
हिचकी आवै जोर की, पिव करता जद याद।
पीव मिळण री आस में, कर रैयी फरियाद।।2।।
शब्दार्थ-हिचकी- एक शारीरिक प्रकिया जिसमें फेफड़े की वायु कुछ अटक-अटककर गले के रास्ते निकलने का प्रयत्न करती है, आवाज़ के साथ रुक रुक कर सांस निकलना, राजस्थानी में जब इस तरह की हिचकी आती तो कहा जाता है कोई अपना याद कर रहा है चितरा रहा है , आवै- आती है ,जोर- तेज तेज ,पिव – प्रियतम ,पति साजन , करता – करते ,जद – जब, पीव – पिया, पति, साजना, प्रियतम, मिळण- मिलन,मिलना, री-की, आस- उम्मीद,आशा,रैयी- रही, फरियाद- दुहाई,विनती,अरज, प्रार्थना,
भावार्थ-
नायिका को बहुत जोर से बार बार हिचकी आ रही है लग रहा उसके प्रियतम उसे याद कर रहे हैं ,और वह भी अपने पिया से मिलने की उम्मीद में दुहाई (विनती) कर रही है ।।
नैणां नेह ऊपजियौ, होठां मुळकण आय।
जद जद पिव नै देखिया, बाछां खिल खिल जाय।।3।।
शब्दार्थ- नैणा – आंखें ,नयन, चक्षु ,नैत्र ,ने – प्रेम ,स्नेह,प्यार ,लाड़ ,ऊपजियौ – उत्पन्न हुआ, पैदा उमड़ना ,होठां – होंठ ,ओंठ, ओष्ठ, अधर ,मुळकण-मुस्कराहट, मंदस्मित ,मंद हास्य,तबस्सुम ,आय- आना ,आती ,जद जद- जब जब,पिव- पति, सजना, नै -को, देखिया – देखा,बाछां- रोम रोम ,रूह रूह ,रग रग,नस नस,खिल खिल- खिलना, प्रफुल्लित होना ,जाय – गया , गई।।
भावार्थ-
अपने प्रियतम को सामने देखकर नायिका के नयनों में प्रेम उमड़ पड़ता है और होंठों पर मुस्कान आ जाती है जब जब वह उन्हे देखती है तो रोम रोम खिल उठता है ।।
सज धज ऊभी गोरड़ी, मन में रयी उमाय।
परस पीव रौ पावणौ, सोच सोच सरमाय।।4।।
शब्दार्थ- सजधज – बनाव ,सिंगार ,श्रृंगार ,सजावट,,दिखावट ,आत्म प्रर्दशन,ऊभी – खड़ी, गोरड़ी – सजनी, मेहबूबा, प्रियतमा,पत्नी वामा ,रयी – रही, उमाय- खुश होना ,परस – स्पर्श ,छुना ,पीव- पति ,रौ- का.पावणौ – पाना ,सोच सोच – सोच सोचकर ,सरमाय – शर्माना ।।
भावार्थ-
नायिका सज धज कर खड़ी है और अपने मन में खुश होती हुई , अपने पति के स्पर्श को पाने की बात को सोचकर ही सरमा रही है ।।
बांचूं प्रवाणौ पिव रौ, हेत हियै में लाय।
नैणां झरतौ नीरड़ौ, मिळणौ कीकर थाय।।5।।
शब्दार्थ-पढ़ना ,पढ़ रही हूं ,परवाणौ- खत ,प्रेम पत्र , चिठ्ठी, संदेस ,पिव – पतिदेव ,रौ – का, हेत – प्रेम , प्यार ,स्नेह ,हियै – ह्रदय ,दिल ,मन ,उर ,अंतस कलेजा ,लाय – लाकर ,नैणां – आंखें ,नयन ,नैत्र ,झरतौ – झरना ,गिरना ,बरसना ,निकलना ,नीरड़ौ -गम में आंखों से बहने वाला पानी , आंसू ,नयनजल ,नीर , मिळणौ – मिलना ,कीकर – कैसै , थाय – जाय ।।
भावार्थ-
विरहन कहती हैं कि मैं प्रियतम का खत ह्रदय के प्रेम के साथ पढ़ रही हूं ,पर मेरी आंखों से आंसू निकलते जा रहे उनसे मिलने के लिए पर उनसे मिलना संभव नहीं है ।।
सेजां बैठी गोरड़ी, अंतस रयी उमाय।
आसी जद मम बालमौ, लेऊं हियै लगाय।।6।।
शब्दार्थ – सेंजा – सुहाग की सेज ,शैया ,पंलग ,बिछोना , गोरड़ी – पत्नी ,दारा तिय, धरनी , वामा , अंतस -अंत करण ,मन, ह्रदय, रयी – रही उमाय – उमंग, मन ही मन में खुश होना , आसी – आएंगे ,जद – जब , मम- मेरा, मेरे ,बालमो – पति ,प्रियतम साजन ,हियै – ह्रदय ,दिल ,लेऊं – लेऊंगी ,लगाय – लगा लेना ।।
भावार्थ-
अपने प्रियतम के इंतजार में सेज पर बैठी नायिका मन में बहुत खुश होते हुए कहती हैं ,जब मेरे साजन आ जाएंगे मैं उन्हें ह्रदय से लगा लूंगी ।।
लीलण घोड़ी नवलखी, मोत्यां जड़ी लगाम।
मधरी मधरी चाल थूं, धण नै करण सलाम।।7।।
शब्दार्थ- लीलण- घोड़ी का नाम, तेजाजी की घोड़ी का नाम भी लीलण था ,घोड़ी – अश्वा ,घोटिका ,नवलखी- नौ लाख की ,मोत्यां – मोतियों से ,जड़ी – सजी हुई, लगाम – घोड़े के मुँह में लगाई जानेवाली बाग समेत छड़, रास · कमान · बाग · दबिश · अंकुश · दबाव · रोक · बागडोर. मधरी मधरी- धीमी धीमी ,धीरे धीरे, मंद मंद , चाल – चल ,थूं – तू ,धण – पत्नी ,नै – को , करण – करने ,सलाम – प्रणाम ।।
भावार्थ-
नायक अपनी प्रियतमा से मिलने के लिए लीलण नाम की घोड़ी जिसकी कीमत नौ लाख रुपए है ,और जिसकी लगाम मोतियों से जड़ी हुई है उस पर सवार होकर कहता है, हे! लीलण जरा आहिस्ता आहिस्ता चल तू ताकि मैं अपनी महबूबा को सलाम के बहाने निहार सकूं ।।
पाती लेजा डाकिया, जा पीव रै देस।
पिव बिन कैड़ौ जीवणौ, कहिजै ओ संदेस।।8।।
शब्दार्थ- पाती – पत्र,खत ,लेजा – लेकर जा ,पीव – पति ,रै – के ,देस – देश ,पिव -पति ,बिन – बिना ,कैड़ौ – कैसै , कैसा ,जीवणौ- जीना ,कहिजै – कहना ,ओ – ये , संदेस – समाचार , संदेश।।
भावार्थ-
विरहन डाकिये से कहती हैं, हे डाकिया मेरा खत लेजा तू जहां मेरे साजन रहते हैं उस देस जाना और मेरा संदेश देते हुए कहना पिया के बगैर किस प्रकार जीना ।।
पिव नजराणौ मेलियौ, आयौ नवलख हार।
बेग गळै में पेरियौ, कुण है निरखणहार।।9।।
शब्दार्थ – पिव – पति ,नजराणौ – उपहार , तोहफा, मेलियौ – भेजा ,आयौ – आया ,नवलख – नौ लाख ,हार – गले में पहनने का आभूषण, बेग – फटाफट ,जल्दी से ,गळै – गला ,पेरियौ – पहना ,धारण किया , कुण – कौन , निरखणहार – निरखने वाला ,देखने वाला ।।
भावार्थ-
अपने प्रियतम के भेजे हुए तोहफे को देखकर नायिका अपने मन की बात कहती है पिया ने उपहार स्वरुप नवलखा हार भेजा है जिसे जल्दी से गले में पहन तो लिया है पर प्रियतम मतलब देखने वाले ही यहां नहीं है तो उसे कौन निरखेगा ।।
पिव तरसै परदेस में, हियै ऊपजै हेत।
मन सूं तरसै ऐकली, सेजां में परणेत।।10।।
शब्दार्थ- पिव -पति, तरसै – बैचैन ,पीड़ित , लालायित,हियै – ह्रदय , अंतर्मन,ऊपजै -उपजता है , उत्पन्न ,हेत- प्रेम ,प्रीत , सूं – से , तरसै – विलाप , पीड़ित, लालायित, ऐकली – अकेली ,सेंजा – पलंग ,बिछोना ,परणेत – जिसके साथ शादी हुई हो , फेरे लिए हुए ,पत्नी
भावार्थ-
नायक और नायिका एक दूसरे से दूर देस में निवास करते हैं जो कि एक दूजे की याद में तड़फते हुए कहते हैं प्रियतम तो परदेस में प्रियतमा की याद में तड़फ रहे ,उसके लिए ह्रदय में बहुत प्रेम उमड़ रहा है,और इधर पत्नी अकेली पति के बगैर सेज में उनकी याद में तड़फ रही है ।।
सेजां सूनी सायबा, आप बसौ परदेस।
नवल वेस धारूं नहीं, हिवड़ै घणौ कळेस।।11।।
शब्दार्थ- सेंजा – बिछौना, ,शैया पंलग, सूनी – सुनसान,एकाकी ,तन्हा ,एकांत शून्य,शांत ,सायबा -पति ,स्वामी , बसौ – बसते हो ,बसना रहना ,नवल – नये , अच्छे ,वेस – कपड़े , पोशाक,सुट धारूं- पहनती हूं ,पहनना, धारण करना ,हिवड़ौ – ह्रदय ,घणौ – बहुत ज्यादा ,कळे
भावार्थ-
विरह में व्याकुल पत्नी अपने पति को याद करते हुए उलाहना देते हुए कहती हैं, हे ! प्रियतम आपके बिना सेज सूनी लगती है क्यूं कि आप तो परदेस में रहते हो , इसलिए मै नयी पोशाक भी धारण नहीं करती क्यूं कि आपके बिना मेरे मन में उथल-पुथल रहती है
अंतस में दिवलौ जळै, प्रीत रयी सरसाय।
बालम थांरी याद में, नैण नीर बरसाय।।12।।
शब्दार्थ- अंतस – अंतर्मन ,दिवलौ – दीपक ,दीया ,जळै – जलता है , प्रज्वलित, प्रीत – प्रेम ,रयौ – रहा ,सरसाय – बढ़ाना ,बढ़ावा , बालम – पति ,थांरी – आपकी ,नैण – नयन , नीर- आसूं , पानी, बरसाय- बरसाते हैं ,बरसना ।।
भावार्थ-
विरह वेदना में जलती हुई विरहन कहती है..मेरे ह्रदय में जो आपकी प्रीत नाम का दीया प्रज्वलित हो रहा है वह प्रीत को बढ़ा रहा है पर आप बहुत दूर है और आपकी याद में मेरे नयनों से आंसू बरस रहे हैं।।
कॅवळै बैठौ कागलौ, बोले मधरा बैन ।
पिव आसी परदेसियो, सखरा करतौ सैन ।।13।।
शब्दार्थ- कॅवळै – मुंडेर ,बैठौ – बैठा ,कागलौ – कौवा ,बोले – बोलना ,बोलता है ,मधरा – मंद मंद, धीरे ,धीमे ,बैन – बोल आसी – आएंगे, परदेसियों – परदेस में रहने वाला ,सखरा – अच्छे , बढ़िया ,सैन – संकेत, इशारा।।
भावार्थ-
पति के इंतजार में पत्नी सगुन मनाते हुए कहती है कि आज घर की मुंडेर पर कौवा बैठा हुआ मीठा मीठा बोल रहा है ,लगता है परदेस गये हुए मेरे पति आने वाले हैं ,कौवा बोलकर ऐसे ही संकेत बता रहा है ।।
सुणौ सखी मम बातड़ी पिव नै लिख संदेस।
ओळूं घणीज आवती, कद दरसेला देस।।14।।
शब्दार्थ- सुणौ – सुनो ,सखी – मित्र ,सहेली , मम- मेरी बातड़ी – बात ,ओळूं – याद घणीज – बहुत ज्यादा, आवती – आती है ,कद – कब , दरसोला – दिखना , दर्शन,आओगे ,देस- स्वदेस , अपना देश ।।
भावार्थ-
प्रियतम की याद में व्याकुल प्रियतमा अपनी सहेली से कहती हैं .. हे ! सखी मेरी बात सुनो ,और मेरे पिया को खत में मेरा संदेश लिखकर कहो कि मुझे आपकी बहुत याद आ रही है आप कब तक अपने देश में आ जाओगे ।।
अन्न छुट्यौ उमराव जी, गळै न उतरै नीर ।
थां बिन बिलखूं बालमा,कवण बँधावै धीर।।15।।
शब्दार्थ- अन्न – धान ,खाना ,छुट्यौ – छुटना ,छुट गया,उमराव जी – पतिदेव जी , गळै – गले ,उतरै – उतरता है ,उतरना नीर – पानी ,जल , थां – तुम , आप ,बिलखूं – कलाप ,विलाप ,तरसना , कवण – कौन ,बॅ॑धावै – बंधाना ,धीर – धैर्य, हौसला ढांढस धीरज ।।
भावार्थ-
पति की याद में व्याकुल पत्नी कहती हैं .. हे! मेरे प्राणानाथ आपकी याद मुझे इतना सताती है कि अन्न तक छुट चुका है मेरे गले से नीचे पानी भी नहीं उतर रहा है,हर समय आपको याद करके रोती रहती हूं ,आपके बिना मुझे दिलासा देने वाला और कौन है यहां ।।
बाजै ठाड़ौ बायरौ ,तारां छाई रात
बैठ उडीकै कंत नै ,कैवण मन री बात।।16।।
शब्दार्थ- बाजै – चलता है ,चलना ,ठाड़ौ – ठंडा ,बायरौ – हवा ,वायु पवन , समीर , तारां – तारे , सितारे, छाई – भरी ,उड़ीकै – राह देखना , इंतजार,बाट निहारना , कंत – पति नै – को , कैवण – कहने के लिए ,कहना, री- की।।
भावार्थ-
ठंडी ठंडी हवा चल रही है ,और सितारों से भरी रात है ऐसे में नायिका अपने पति के इंतजार में बैठी है कि कब वे आए और मै उनसे अपने मन की बात कह सकूं ।।
काग उडाऊं रोजगा ,कनक चोंच मंडाय ।
पिव आवै जै पांवणा , लेऊं हियै लगाय।।17।।
शब्दार्थ- काग – कौवा ,रोजगा – रोज के , हमेशा ,कनक – सोना , सुवर्ण मंडाय – बनवाना , मंडवाना आवै – आना ,जै – तौ , पांवणा – मेहमान , लेऊं- लेऊंगी ,लेना ,हियै – दिल से ,लगाय – लगाना ।।
भावार्थ-
परदेस में गये अपने पति के आने का इंतजार करती हुई पत्नी कौवै को उड़ाती हुई कहती हैं .. हे ! काक मेरे प्रिय पति घर आए तो तू उड़कर सगुन बता मैं तेरी चोंच सोने की बनवा दूंगी मेरे पति मिजमान आ जाए तो उन्हें गले से लगा लूंगी।।
सुपनौ आयौ हे सखी, झटपट कर तैयार।
साजन आसी सांझ नै , कर बैगौ सिणगार ।।18।।
शब्दार्थ- सुपनौ – सपना ,ख्वाब, आयौ – आया ,आना , झटपट- फटाफट ,जल्दी , आसी – आएंगे,सांझ – शाम , संध्या,नै – को ,बैगौ – फटाफट , जल्दी, सिणगार – सजावट ।।
भावार्थ-
प्रियतमा अपनी सहेली से अपने सपने की बात करते हुए कहती हैं .. हे! सखी मुझे सपना आया है ,तू मुझे फटाफट
तैयार कर दे मैनै सपने में देखा आज शाम को मेरे पतिदेव घर आ रहे हैं इसलिए तू देर मत कर और जल्दी से मेरा श्रृंगार कर दे ।।
सूनी हुयगी ऄ सखी , उर री मेडी आज ।
सरहद जावै सायबौ ,सुण सी कुण अब साज।।19।।
शब्दार्थ- सूनी – सुनसान एकाकी, तन्हा, ऄ- हे ,उर – अंतस , अंतर्मन ह्रदय ,मन ,री – की ,मेडी – महल ,सरहद – सीमा ,जावै – जा रहे हैं ,जाता है ,सायबौ – पति ,सुणसी – सुनना , सुनेगा ,कुण – कौन ,साज – संगीत ।।
भावार्थ-
विरह से पीड़ित विरहन कहती हैं.. हे ! सखी आज तो मेरे मन का महल भी सूना हो गया है क्यूं कि मेरे पति सीमा पर जा रहे हैं ,मेरी चूड़ी पायल की झंकार के साज कौन सुनेगा अब ।।
पाती पढ़ता प्रीत री, हिवडै उठी हिलोर।
आखर बिच छिब उभरती, दरसै मम चितचोर।।20।।
शब्दार्थ- पाती – पत्र ,पढ़ता – पढ़ते हुए, पढ़ना ,प्रीत – प्रेम ,री -की हिवड़ै – ह्रदय में ,दिल ,उठी – उठना ,हिलोर – तरंग ,आखर – शब्द ,अक्षर ,बिच – बीच में ,छिब – छवि, तस्वीर ,फोटो , उभरती – सामने आती है , सामने ,दरसै – दिखना ,मम – मेरा ,चितचोर – मन की शांति चुराने वाला ।।
भावार्थ-
नायिका अपने प्रियतम के प्रेम पत्र को पढ़ते हुए उनके प्रेम को महसूस करते हुए कहती है.. प्रेम पत्र पढ़ते पढ़ते मेरे ह्रदय में तंरग सी उठ रही है क्यूं कि शब्दो के बीच में जिसने मेरा मन चित चुरा लिया है उनकी छवि नजर आ रही है।।
पिव जी थांरी प्रीतड़ी, बिसरी किण विध जाय।
अंतस पीड़ा ऊठती, सूळां रयी चुभाय।।21।।
शब्दार्थ- पिवजी – प्रियतम,पति, थांरी-आपकी, प्रीतड़ी – प्रीत, प्यार , बिसरी – भूली,किण विध – कैसे ,किस तरह । अंतस – ह्रदय,ऊठती- उठना, सूळां- कांटे,रयी-रही ,चुभाय- चुभाना।
भावार्थ – नायिका अपने प्रियतम को याद करते हुए कहती हैं हे प्रिय आपकी प्रीत को किस तरह से भूलाऊं मैं आपकी यादें तो कांटे की तरह चुभ कर मेरे दिल को पीड़ा की तरह सता रही है,मतलब विरह वेदना बढ़ा रही है ।

राजस्थानी में लेखन: 14-15 बरसों का अनुभव
दीठ- दरसाव ( राजस्थानी कविता संग्रह)2022, राजस्थानी निबंध संग्रह ” सोनल वरणी संस्कृति” 2023

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