भोलेनाथ को याव

एक वार की वात छे,भोलेनाथ को याव निकळ्यो थो। सब नऽ खऽ बुलावो भेज्यो थो, पण गणपति जी खऽ भूलिगया।

गणपति जी खऽ घुस्सो तो खोब आयो पण उन्नऽ सोच्यो की देखुंज मखऽ छोड़िनऽनऽ कसो याव करज भाईजी।

सब तैयारी नऽ हुई गई थी नऽ। अवं वरात निकळनऽ वाळई थी।
सबई भूत पलित, न गण नऽ का सात म वरात निकळई थोड़ी दूर तक नाचता गावता गया एतरा मऽ भोलेनाथ का रथ को चक्को फंसी गयो।

निच्चऽ पोकळो थो।
गणपति जी नऽ घुस्सा मऽ उनका गण (उंदरा) नऽ खऽ कई दियो थो कि रस्ता खऽ पोकळो करी दीजो। फिरी देखूंज कसा जायगा भाईजी मखऽ छोड़ि नऽ नऽ।

सब वराती, नन्दी,भूत पलित होण खोब कोसिस करि रह्या था पण चक्को हलतो न्नी थो।

एतरा मऽ एक गण नऽ कयो कि उंदरा नऽ नऽ पोकळो करी दियोज रे रस्तो, एका सी चक्को फसी गयोज।जसोज उंदरा नऽ को नाव लियो, भोलेनाथ खऽ हेर आई गयो कि गणपति खऽ तो भूलिज गया अपूण!

तंवऽ भोलेनाथ गया नऽ गणपति खऽ मनाई नऽ नऽ लाया।
पयलऽ तो गणपति जी नऽ खोब आमळो कर्यो कि तुम नऽ ज मखऽ वर दियो कि म्हारा बिना कोई शुभ काम नई होणऽ कोऽ। अनऽ तुम आज मखज भूलि गया। हंऊ नी जाणऽको।

फिरी भोलेनाथ नऽ नंदी सी मोदक मंगाड़्यो नऽ गणपति जी खऽ खवाड़्यो। फिरी उ जराक ठंडा पड़्या।

गणपति जी नऽ उंदरा नऽ खऽ कयो कि जमीन खऽ पछी भरी देओऽ रे।

ओका बाद गाजा बाजा सी वरात गई नऽ खोब धूमधाम सी याव हुयो।

• एकता कश्मीरे


अनुवाद

शीर्षक :- भोलेनाथ का विवाह

एक बार की बात है, भोलेनाथ का विवाह निकला। सब देवताओं और गणों को बुलावा भेजा गया, परंतु गणपति जी को बुलाना ही भूल गए।

गणपति जी को जब यह बात पता चली तो उन्हें बहुत क्रोध आया। फिर भी उन्होंने सोचा कि देखता हूँ, मेरे बिना विवाह कैसे संपन्न होता है।

सभी तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं और बारात निकलने वाली थी। भूत-प्रेत और गण नाचते-गाते आगे बढ़े। तभी थोड़ी ही दूर पर शिवजी के रथ का पहिया कीचड़ में धँस गया।

नीचे की ज़मीन खोखली थी। गणपति जी ने क्रोध में अपने वाहन मूषक को आदेश दिया – “जाकर रास्ता खोद दो, देखता हूँ मेरे बिना बारात कैसे आगे बढ़ती है।”

सभी बाराती, नंदी, गण,भूत-प्रेत मिलकर बहुत प्रयास करते रहे, लेकिन पहिया अपनी जगह से हिलता ही नहीं था।

तभी एक गण ने कहा -“मूषक ने रास्ता खोद दिया है, इसीलिए पहिया फँसा है।”
जैसे ही मूषक का नाम लिया गया, भोलेनाथ को ध्यान आया कि गणपति जी को तो वे आमंत्रित करना ही भूल गए हैं।

तब शिवजी स्वयं गणपति जी के पास गए और उन्हें प्यार से मनाकर बारात में लाए।

शुरुआत में गणपति जी ने बेहद क्रोध दिखाया और कहा –
“आपने तो मुझे वरदान दिया था कि मेरे बिना कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ नहीं होगा। फिर भी आज आप मुझे भूल गए, यह कैसे हो सकता है?”

फिर भोलेनाथ ने नंदी से मोदक मँगवाकर गणपति जी को प्यार से खिलाए और उन्हें शांत किया।

इसके बाद गणपति जी ने अपने मूषक से कहा- “अब गड्ढों को फिर से भर दो।”

उसके बाद गाजे-बाजे के साथ बारात निकली और बड़े धूमधाम से शिव पार्वती विवाह सम्पन्न हुआ।

एकता कश्मीरे


कुछ लोग यह शंका करते हैं कि गणेश जी अगर भगवान शिव के पुत्र हैं तो फिर अपने विवाह में शिव-पार्वती ने उनका पूजन कैसे किया। इस शंका का समाधान गोस्वामी तुलसीदास निम्नलिखित दोहे में करते हैं-

मुनि अनुशासन गनपतिहि पूजेहु शंभु भवानि।
कोउ सुनि संशय करै जनि सुर अनादि जिय जानि।।

अर्थात,विवाह के समय ब्रह्मवेत्ता मुनियों के निर्देश पर शिव-पार्वती ने गणपति की पूजा संपन्न की। कोई व्यक्ति संशय न करें क्योंकि देवता (गणपति)अनादि होते हैं।

पौराणिक विवरण के अनुसार भगवान शिव ने महागणपति की आराधना की और उनसे वरदान प्राप्त किया कि आप मेरे पुत्र के रूप में अवतार लें। इसलिए भगवान महागणपति गणेश के रूप में शिव-पार्वती के पुत्र होकर अवतरित हुए।

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