मरु की माटी बोल उठी,
धूप में भी जल नहीं पिघली,
रेत के कण-कण में बसती,
गौरव गाथा स्वर्ण लिखी।
जहाँ हवाओं में लोक गीत हैं,
और पग-पग पर वंदन होता,
जहाँ चूड़ियों की खनक सुनाई दे,
घाघरा का हर रंग अनोखा।
वह राजस्थान…
जहाँ सूर्य देव भी शीश नवाएँ,
राणा की तलवारें कहानियाँ कह जाएँ,
जहाँ मीरा का भजन गूंजता है,
और पावन प्रेम भी पूजा बन जाए।
ऊँटों की चाल में ठहराव है,
और पनघट की रुनझुन में प्यार,
जहाँ ठेठ भाषा में मिठास है,
हर बोली में है मनुहार।
म्हारी धरती –
कभी केसरिया बाना पहन ले,
तो कभी पगड़ी से सम्मान करे,
माताएं वीरों को जनम दे,
और कुर्बानी को वरदान करे।
किले, हवेलियाँ, महलों की शोभा,
चित्रित दीवारें, जालीदार झरोखे,
कला-संस्कृति की गौरवगाथा,
हर पत्थर में छिपे कितने दोहे।
गीतां में ढोला–मारू की विरह है,
घूमर में है सौंदर्य का रस,
जहाँ तीज, गणगौर, मेलों में,
सजीव हो उठता है उत्सव हर बस।
राजस्थान…
ना सिर्फ़ धरती का टुकड़ा है,
यह तो इतिहास की सांसें है,
परंपरा की थाती है,
और अस्मिता की परछाईं है।
“आओ नमन करें उस संस्कृति को,
जो तपती रेत में भी गुलाब उगाए,
जहाँ स्वाभिमान की कीमत पर,
कोई झुके नहीं, चाहे जो भी आए।”
-रेनू शब्दमुखर
