कविता

एक आदमी ने
कल छींक दिया,
गर्दन की हड्डी उखड़ गयी।

एक बच्चा
दोहरी छत से गिरा,
बिल्कुल स्वस्थ हो गया-
तनिक देर रोने के बाद।

कल शाम को गिरा था बनवारी
आँवले के पेड़ से
पक्की सड़क पर,
बाल भी बाँका नहीं हुआ।

पूरे साल प्रतीक्षा करने के बाद
आने लगे-
कनेर में गुलाबी फूल।
निकलने लगे-
हरसिंगार की जड़ से
नये-नये कल्ले।

आम के
बूढ़े पेड़ भी होने लगे हैं जवान।

इस बौराये मौसम में
देने लगे हैं गुलाब के फूल-
फल।
सबका वैलेण्टाइन व्यर्थ नहीं जाता।

गेहूँ के खेतों में
गेहूँ की बालियों से पहले ही
ऊर्ध्वगामी होने लगी हैं-
घासों की फसल।
जिनको काटा जाता है,
वे ज्यादा हरियाते हैं।

इधर-उधर दिन-भर
खाने-गाने के बाद
लौट रहे हैं पक्षियों के दल-
अपने-अपने नीड़ों में।

आदमी जितना बेबस कोई नहीं,
जो घर में रहते हुए भी
घर में नहीं रहता।

अब नहीं उड़ती गाँवों में-
गायों के खुर से
गोधूलि की गन्ध।
अब चरवाहे
मस्त होकर नहीं लौटते।

किसी ने
अति का अतिक्रमण किया,
सुख खिसक गया-
दबे पाँव जीवन से।

तुमसे बात करने के समय
कविताओं में अंकित किये गये-
न मिल पाने के दुःख।
प्यार करने के समय में
कविताओं को भरपूर जिया गया।

संयोग के
सबसे व्याकुल पलों में
माँग लिया गया-
अँजुरी-भर सुख याचक बनकर।

ईश्वर के पास सर्वाधिकार सुरक्षित हैं।

धर्मेन्द्र कुमार मौर्य

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