मिनी

मिनी ज़िद पर अड़ गई थी। उसकी ज़िद के आगे नीला को अपनी ज़िद छोड़नी पड़ी। हालांकि यह सब करते हुए नीला को कई पहाड़, कई दरिया,कई सहरे पार करने पड़े। इन तकलीफ़देह मुश्किलों से वह सायास बचने की कोशिश करती रही है अबतक। लेकिन मिनी की ज़िद ने उसे उन्हीं बीहड़ों में लौटने को विवश कर दिया था। उन रास्तों पर जिनसे होकर गुजरे अपने पांवों के निशान भी वह मिटा चुकी थी। लेकिन इक्कीस साल बाद… मिनी वक़्त की रील को रिवाइंड करने को कह रही थी। उस अतीत को उपस्थित करने की ज़िद कर रही थी,जिससे वह कब की मुक्त हो चुकी थी। एक बार फिर उसी व्यतीत की ओर मुड़ कर देखने की कल्पना उसे सिहरा गई थी। मिनी पहले भी कभी-कभी जिज्ञासा करती थी… इसरार करती थी… पर अब वह सीधे सवाल करने लगी थी। एकदम से ज़िद पर उतर आई थी।
गुज़िश्ता दिनों में नीला अक्सर मिनी को किसी न किसी बहाने बहला देती थी। तब मिनी भी अड़ती नहीं थी। शायद उसकी उम्र की मासूमियत इससे ज़्यादा सोच नहीं पाती थी। लेकिन अब दिनोंदिन मिनी की जिज्ञासा ज़िद में बदलती जा रही थी,’हू वाज ही? क्या नाम था उनका?’
मिनी अब बड़ी हो चुकी थी, उम्र, क़द, सोच हर लिहाज़ से। उसकी आँखों में ताज़ा उजाले की चमक थी। चेहरे पर गाढ़े विश्वास की दृढ़ता। वह अच्छा-बुरा सब समझने लगी थी। आँखों में आँखें डालकर बहस करने को तत्पर। अब उसे बहलाना संभव नहीं था।
शुरु में नीला ने उसके सवाल को पहले ही की तरह टालने की कोशिश ज़रूर की ,’मिनी, ऐसे सवालों में ख़ुद को उलझाने के बजाय तुम्हे अपने फ्यूचर के बारे में सोचना चाहिए।’
बगैर देर किये मिनी ने ज़वाब दे दिया था, ‘ मेरा फ्यूचर मेरे इस सवाल से जुड़ा है। तुम्हें मेरे सवाल को टालना नहीं चाहिए!’
नीला अवाक! मिनी के स्वर और तेवर में ऐसी त्वरा थी, कि उसे पल भर को विश्वास ही नहीं हुआ कि क्या कह रही है ये लड़की? पहले तो कभी ऐसे पेश नहीं आई! वह तो यही समझती रही कि मिनी एक ऐसी लड़की है, जो उसकी परवरिश का, उसके संघर्ष का, उसके जुझारूपन का, उसके निर्णयों का, उसके भरोसे का सम्मान करती है। जो जानती है कि उसकी मां मिट्टी नहीं, मिजाज़ से बनी है। उस मिजाज़ से जिसने कभी झुकना नहीं जाना। लेकिन यह लड़की तो आज जैसे उसे ही झुकाने पर तुली है।
‘ मिनी, तुम जानती हो मैंने तुमसे कभी कुछ नहीं छुपाया। यू आर माई बेस्ट फ्रेंड।’ नीला ने उम्मीद की डोर नहीं छोड़ी।
‘ नहीं… ऐसा नहीं है। तुमने उतना ही बताया, जितना तुमने बताना चाहा। उतना ही अनावृत किया, जितना तुम्हारा सत्य तुम्हारे पक्ष में दिखे।’ दलील की ओट में यह मिनी का आरोप था।
नीला को समझ में आ गया था कि अब मिनी बच्ची नहीं रही, कि उसे इधर-उधर की बातों में बहलाया जा सके। वह इक्कीस साल की एक भरी-पूरी लड़की है, जो क़द में उससे भी अंगुल भर लंबी आती है, जो उसी की तरह अड़ती है, लड़ती है और खुदमुख़्तार है।
उसे चुप देख, मिनी अपने कमरे में चली गई थी। वह मिनी को जाते हुए देखती रही, गोया मिनी नहीं वह ख़ुद हो। जब भी उसके मन का कुछ नहीं होता था, वह भी चुपचाप दृश्य से हट जाती थी। यह विरोध था, ज़िद थी। हूबहू ऐसी ही थी वह। मन ही मन मुस्करा पड़ी नीला।

जब से मिनी दुनिया को देखने-समझने लगी थी,अक्सर कोई न कोई कठिन सवाल कर बैठती,’ममा,सबके पापा साथ रहते हैं, मेरे पापा क्यों नहीं ?’
वह हंस कर मिनी को अपने पास खींचती और समझाती,’ बेटा, जो पास नहीं, उसके लिए क्या सोचना?’
नीला का यह ज़वाब मिनी की समझ में कभी नहीं आया , लेकिन उसके चेहरे पर पसर आई उदासी को देखकर नीला उसका मन बहलाने के लिए ध्यान बंटाती ,’अच्छा बताओ तो बड़ी होकर तुम क्या बनना चाहती हो?’
अजीब था कि यह सुनकर मिनी का चेहरा खिल जाता। वह एकबारगी चहक पड़ती,’ मैं टीचर बनना चाहती हूं।’
‘ लेकिन तुम तो उस दिन सोशल वर्कर बनने की बात कर रही थी।’
‘ नो… नो… तुम तो सोशल वर्क कर ही रही हो न!’ मिनी तैश में आ गई थी।
उस दिन मिनी का यह लहज़ा नीला को भीतर तक चुभ गया था। मिनी के चेहरे पर पठार-सा सपाटपन था । पूछना चाहा,मिनी तुम्हे मेरे काम से इतनी बेज़ारी क्यों है? लेकिन यह सोचकर चुप रह गई, कि मिनी ने यह बात शायद नाराज़गी में कही होगी, जबकि उसका इरादा कतई ऐसा नहीं होगा। मिनी की यह नाराज़गी तब और बढ़ जाती,जब वह देर से घर लौटती। मिनी का मासूम चेहरा उतरा होता, कोई स्याही-सी लिपी होती, नीला उसे बाहों में भरकर चूमने लगती, ‘ मेरा बच्चा… मेरा प्यारा बच्चा। मम्मी से नाराज़ हो?’
मिनी कुछ बोलने के बजाय अपने होंठ और कसकर भींच लेती। यह मिनी का विरोध होता, वह समझती थी। उसका गुस्सा कम करने के लिए कहती,’ मिनी, मेरा काम ही ऐसा है। समय में कुछ नहीं बंधा।’
मिनी की प्रश्नवाचक आँखें उसके चेहरे पर टंक जातीं। वह मिनी के गालों को चूमते हुए प्यार से समझाती,’ बेटा, किसी की ज़रूरत में काम आना, किसी बेसहारे की मदद करना, किसी के उजड़े घर को बसा देना, ऐसे तमाम काम हैं, जिन्हें करने के लिए समय देखना संभव नहीं होता। यू नो, योर मम्मा इज नॉट जस्ट अ वर्किंग लेडी। सोशल वर्क बहुत बड़ा काम है। हाइली डिवोटेड टू ह्यूमिनिटी।’
मिनी सो चुकी होती। उसे बिस्तर पर लिटाते हुए वह थोड़ी भीगी होती। उसकी इस मनःस्थिति को भांपकर दया कहती,’ मिनी खाना खा चुकी है। दूध भी पी चुकी है। थककर सो गई लगती है।’
नीला जानती है, मिनी उसकी प्रतीक्षा करते-करते थक चुकी होती है। मन को समझाती, यार मिनी को टाइम देना ही चाहिए। वह मासूम क्या जाने कि मैं क्या करती हूं, कि मेरा क्या कमिटमेंट है? वह मेरी बेटी है, उसका हक़ है। वह रात में कई-कई बार मिनी को चूमती, उसे अपने सीने में भींचकर थपकियां देती , गोया उसकी नींद न टूटे। यह रात की ममता, भावुकता और आत्मालाप सुबह के साथ ही काफ़ूर हो जाता। चाय की पहली सिप के साथ वह दिनभर के कामों की रुपरेखा बनाती। दया जबतक नाश्ता बनाती, वह नहा-धोकर तैयार हो जाती। जल्दी-जल्दी नाश्ता करते हुए दया को ताकीद करती,’ मिनी के टिफिन में पराठा,भुजिया और ड्राई फ्रूट्स दे देना। नाश्ते में ऑमलेट, ब्रेड और दूध देना।’
उस दिन दया ने बताया था,’मिनी आजकल ऑमलेट नहीं खा रही।’
‘ क्यों?’
‘ रोज़-रोज़ ऑमलेट खा के बोर हो गई हूं।’ आँख मलती मिनी की आवाज़ आई थी।
‘ ओह मेरा बच्चा, जाग गया।’ नीला ने हहाकर मिनी को पास बुलाया था,’ फिर क्या खाना है? जो मन हो दया बना देगी।’
‘ ठीक है।’ मिनी संक्षिप्त उत्तर देकर बाथरूम में चली गई थी ।

जैसे-जैसे मिनी बड़ी होती गई, नीला की व्यस्तता और विवशता को समझती गई। वह समझने लगी थी कि नीला सिर्फ उसकी मां नहीं, बल्कि बेसहारा औरतों की बेपनाह उम्मीदों का आसरा भी है। उसे अपनी बाहों में बांधकर, दायरे में घेरकर रखना… उसके श्रम, साधना और लक्ष्य से वंचित करना, किसी गुनाह से कम नहीं। यह सोचती हुई मिनी जब नीला की तरफ देखती, तो लगता वह रौशनी का कोई पुंज है,जो हर अंधेरे में बंट जाना चाहती है। ऐसी मां की बेटी होने के ख़याल से उसका मन पुलक से भर जाता। नीला ने ऐसे ही किसी दिन मिनी को मंद-मंद मुस्कुराते देख पूछ लिया था,’ क्या बात है, इतना ख़ुश नज़र आ रही हो?’
‘ मां, तुम कितनी अच्छी हो?’ नीला की मुस्कुराहट छलकी पड़ रही थी।
‘ अच्छा, कितनी अच्छी?’
मिनी ने दोनों बाहें फैलाकर बताया,’ इतनी !’
ये मिनी और उसके बीच बढ़ रहे दोस्ताने के दिन थे। मिनी की उम्र बढ़ रही थी, नीला की जिम्मेदारी। वह मिनी को साहसी, स्वाभिमानी और सामर्थ्यवन देखना चाहती थी। अपना निर्णय स्वयं लेने के लिए उसे तैयार करती, प्रेरित करती। उसे संतोष होता कि मिनी धीरे-धीरे उसी तरह अमल करने लगी है जैसा वह चाहती रही है। स्कूल में कोई लड़का उसे छेड़ता तो पलटकर ज़वाब दे देती,’औकात में रह नहीं तो थूथन तोड़ दूंगी।’
लड़का देखता रह जाता और मिनी ये जा, वो जा। वह बेबाक़, बोल्ड और लॉजिकल होती गई थी। इसका असर ये हुआ कि वह नीला से भी बहस करने लगी थी,’ तुमने अकेले रहना क्यों चुना?’
नीला मुस्कुराती… उसकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए बोलती,’मेरी मर्ज़ी।’
‘ सबकुछ तुम्हारी मर्ज़ी से चलता है?’ मिनी पूछती।
‘ मेरी ज़िंदगी मेरी मर्ज़ी से ही चलेगी न? इसमें ग़लत क्या है?’
‘ मतलब मैं भी अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जी सकती हूं? ‘
‘ बिल्कुल। हर किसी को अपनी ज़िंदगी अपनी तरह से जीने का हक़ है।’
‘ ओके! तो मुझे फ्यूचर में क्या करना है यह भी तय करने का हक़ मुझे है?’ मिनी के सवाल में यक़ीन न आने की उलझन थी।
यक़ीन दिलाने के लिए नीला ने ज़ोर देकर कहा,’ बिल्कुल!’
‘ मैं पेंटिंग करना चाहती हूं। दुनिया को रंगों से भर देना चाहती हूं।’ चहकती हुई मिनी ने इच्छा व्यक्त की।
‘ यह तो बहुत अच्छा ख़याल है। वाक़ई दुनिया को ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन तुम तो उस दिन म्यूजिक सीखने को बोल रही थी।’ नीला ने याद दिलाया।
‘ वो उस दिन की बात थी न! आज की बात आज करो!’ मिनी ठुनक पड़ी।
‘ मिनी, तुम किसी एक बात पर स्टैंड नहीं करती, ये ठीक नहीं। मुझे लग रहा तुम कंफ्यूज हो? ‘
‘ मॉम, दुनिया में करने के लिए इतना कुछ है। किसी एक बात पर क्यों टिकना? पॉसिबिलिटी को एक्सप्लोर करने में हर्ज़ क्या है?’ मिनी ने अपनी बात पर ज़ोर देकर पूछा।
अपनी किशोर हो रही बेटी के तर्कों, सवालों और जिज्ञासाओं को एन्जॉय करते हुए नीला ने समझाया,’ पहले इंटर कर लो, फिर सोचना क्या करना है!’
नीला को उठते देखकर मिनी ने याद दिलाया ,’आज पैरेंट्स मीटिंग है, याद है न? ‘
‘ बिल्कुल याद है बेटा… कभी मिस किया? ‘ बैग संभालते हुए नीला ने आश्वस्त किया,’ मैं टाइम से पहुंच जाऊंगी।’
मिनी जैसे-जैसे बड़ी होती गई, उसका आत्मविश्वास बढ़ता गया। नीला उसे आत्मनिर्भर बनाती गई।वह कभी किसी के सामने कमज़ोर न पड़े, किसी की मुहताज़ न हो, उसमें ख़ुद को लेकर कोई कमतरी ना हो, बेचारगी ना पैदा हो। यह सब सिखाते-बताते हुए नीला को गर्व होता कि वह जैसा चाहती रही है, मिनी वैसी ही बन रही है। कभी-कभी दया कहती,’ मिनी बिल्कुल आपकी कॉपी होती जा रही है।’
सिंगल मदर होने का गर्व नीला के आत्मविश्वास को कहीं ज़्यादा दृढ़ कर देता। वह जिस बात के लिए सबसे ज़्यादा सतर्क रही। वह यह कि मिनी के पालन-पोषण में कोई कमी न रहे। कभी किसी को, यहां तक कि मिनी को भी कोई शिकायत का मौका न मिले। लाख व्यस्त रही, लेकिन मिनी के स्कूल में होने वाली पैरेंट्स मीटिंग हो या एनुअल फंक्शन, शामिल होना कभी नहीं भूली। ऐसी ही किसी मीटिंग के दौरान मिनी की क्लास टीचर मिसेज़ चटर्जी ने उसे रोककर कहा था,’ आप अपनी बेटी के प्रति बहुत कांशस हैं। मिनी भी ख़ुद को लेकर बहुत कॉन्फिडेंट है।’
उसने आश्वस्ति से भरकर मिनी को कंधे से पकड़कर अपने करीब खींच लिया था। ऐसे क्षणों में वह महसूस करती मिनी उसके होने की कठिन परीक्षा है, जिसे उसे हर दिन पास करना होता है।
उस दिन स्कूल से निकलते हुए उन दोनों के बीच चुप्पी चलती रही…नीला को लग रहा था इस चुप्पी को पार करना आसान नहीं है। चुप्पी के दूसरे छोर पर खड़ी मिनी आवाज़ लगा रही थी,
‘ ममा, पापा कहां हैं?’
‘तुमको मुझसे कोई शिकायत है,मिनी ?’ यह पूछते हुए नीला ने जैसे ख़ुद को अपराधबोध में घिरा पाया था। इस दौरान वह कितने ही खंड़ों में टूट चुकी थी। कितनी ही आशंकाओं में जकड़ चुकी थी।
मिनी ने भिंची हुई मुखमुद्रा के साथ ‘ना’ में सर हिलाया था। फिर वह चुप्पी घिसटती हुई घर तक आयी थी। नीला ने मिनी को अपने पास बिठाकर पूछा,’ तुम्हारे मन में ये प्रश्न क्यों आया?’
मिनी कोई ज़वाब नहीं दे पाई थी। शायद उसके पास कोई ज़वाब था भी नहीं। बस कोई कमी-सी थी, जो उसके मन को टीसती और वह यह सवाल पूछ बैठती।
ऐसे उलझन भरे मौकों पर मिनी का ध्यान बंटाने के लिए नीला मुस्कुराकर पूछती,’ तुमने सोचा, फ्यूचर में क्या करना चाहती हो?’
‘ हां, सोचा है। ‘ मिनी के भीतर गुदगुदी-सी उठती और चेहरे का रंग गुलाबी हो उठता,’ डांस… डांस करना चाहती हूं। नाचते हुए दुनिया बहुत अच्छी लगती है।’
‘ तो, डांस क्लास ज्वाइन कर लो!’ नीला उत्साहित करती।
‘ अभी नहीं… अभी कुछ और सोचने दो!’ मिनी हमेशा की तरह बात टालती दिखती।
‘ मिनी, मुझे लगता है, तुम ख़ुद को लेकर श्योर नहीं हो। क्या करना चाहती हो ख़ुद पता नहीं।’ नीला छेड़ती।
‘ तो तुम बताओ ना मैं क्या करुं? क्या करना चाहिए मुझे?’ नीला की आँखों में झांकते हुए मिनी पूछती।
‘ ये फ़ैसला तो तुम्हें ख़ुद ही करना होगा।’
‘ ओके, मैं अपने पापा को तलाशना चाहती हूं। उनके बारे में जानना चाहती हूं।’ फ़ैसलाकुन लहज़े में बोलते हुए मिनी पहलीबार किसी असमंजस में नहीं थी।

नीला को समझ आ गया था, कि मिनी को खामख्वाह बहलाना संभव नहीं, कि अब समय आ गया है, कि उसे मिलन के बारे में बता दिया जाय, कि मिलन उसका पिता है और उसके बारे में जानने का उसका हक़ है। हालांकि यह सब बताना भी आसान नहीं। लाख कहे कि वह मिलन को भूल गई है, कि उसके लिए मिलन का पास होना कभी ज़रूरी नहीं रहा। लेकिन तवील रातों के सन्नाटों में अचानक उग आते सेंहुड़ के जंगल में वह लहूलुहान न हुई हो… ऐसा भी नहीं… रिसता रक्त आत्मा को भिगोता और वह उसमें उंगलियां डुबाकर लिखती- मिलन।
यह मिलन पहलीबार उससे तब मिला था, जब वह मिसेज़ काला की संस्था ‘साथिया’ से जुड़ी थी। वह ‘साथिया’ के ऑफिस आया था और छूटते ही बोला था,’ मिसेज़ काला से मिलना है।’
नीला ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा था, गंदुमी चेहरे पर उगी दाढ़ी, आँखों में भेदती तीव्रता। जीन्स पर खड़े गले वाला कुर्ता और कंधे से झूलता शांतिनिकेतनी थैला।
‘आप?’
‘ मैं… मिलन… मिलन दास,सीनियर रिपोर्टर ‘नई ख़बर?’ मिसेज़ काला ने मुझे बुलाया था।’ मिलन अपना परिचय देते हुए थोड़ा नाखुश लगा,शायद मिसेज़ काला के बुलावे के बावज़ूद उनका वहां न होना उसे नागवार गुजरा था।
नीला मिलन को बैठने का आग्रह करते हुए बोली,’ मैं नीला हूं। ‘साथिया’ की कोऑर्डिनेटर। मिसेज़ काला आती ही होंगी। शायद कहीं जाम में फंस गई होंगी।’
मिलन ने बिना किसी भूमिका के पूछा,’ आप यहां कब से हैं? ‘
नीला की भौंहें चढ़ गईं,’ क्यों जानना चाहते हैं आप ?’
‘सॉरी!’ मिलन को अहसास हुआ कि उसका सवाल नीला को नागवार गुजरा है, कि खामख्वाह पर्सनल हो रहा है।
नीला ने कॉल बेल बजाई। चिड़िया की चीं चीं चीं का कलरव गूंज गया… जब तक आवाज़ शांत हुई
दरवाज़े पर रेवती प्रकट हुई। उससे मुख़ातिब हो नीला ने पूछा,’ कुछ चाय-कॉफी मिल सकती है? ‘
‘अरे, परेशान होने की ज़रूरत नहीं है।’ मिलन ने झिझक के साथ कहा।
दोनों के बीच अभी-अभी उभरी तल्ख़ी स्वतः तिरोहित हो गई थी।
‘ हम रसोई भी चलाते हैं। वर्किंग लोगों के लिए टिफिन तैयार करते हैं।’ नीला ने उसकी झिझक को तोड़ा।
‘ इसका मतलब यहां बना-बनाया खाना भी मिल सकता है? ‘
‘ हां, बिल्कुल… आपको चाहिए क्या?’ चुहल भरी मुस्कान के बीच नीला ने उत्सुकता दिखाई।
‘ सोचूंगा।’ संक्षिप्त उत्तर देकर मिलन भी मुस्कुराया।
इसी बीच फोन की घंटी बजी। नीला ने फोन उठाया। दूसरी ओर मिसेज़ काला थीं। नीला ने जब मिलन के आने की सूचना दी तो मिसेज़ काला ने उसे कुछ हिदायत दी, जिसके ज़वाब में उसने कहा ,’ओके।’
फोन रखकर नीला मिलन से मुख़ातिब हुई,’ सॉरी मिलन जी, मिसेज़ काला नहीं आ पा रही हैं, सोशल वेलफेयर मंत्री के साथ उन्हें जरुरी मीटिंग के लिये जाना पड़ रहा है।’
‘ नीला जी, मिसेज़ काला की ओर से आप क्यों सफाई दे रही हैं ?’आख़िरकार मिलन ने उसे धर लिया था।
मिलन के सवाल का आशय समझते ही झेंप गई वह। हड़बड़कर बोली,’आइये आपको ‘साथिया’ दिखाती हूं!’
मिलन नीला के साथ हो लिया था । अंदर एक हॉलनुमा बड़ा-सा कमरा था, उसकी दीवारों पर लगे डिस्प्ले बोर्ड पर टंकी अनेक तस्वीरें थीं, अख़बारों में छपी ख़बरों की कटिंग थी। कुछ तस्वीरों में किसी मंत्री या अफसर के साथ मिसेज़ काला खड़ी थीं मुस्कराती… भावविभोर होती। एक- दो तस्वीरों में कुछ युवा, कुछ अधेड़ स्त्रियां थीं, बेरंग चेहरे और स्वप्नहीन आँखों से झांकती उदासियां लिए। उन तस्वीरों के बारे में नीला ने बताया,’ये कोठों से बचाई गई औरतें हैं।’
मिलन ने आंखें उठाकर नीला को देखा। वह बोले जा रही थी,’पुलिस की मदद से हम उनका रेस्क्यू कराते हैं। ‘साथिया’ में उन्हें संरक्षण मिलता है। यहीं उनके लायक हुनर की ट्रेनिंग दी जाती है। जागरूक किया जाता है। उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश की जाती है।’
नीला के साथ चलते हुए मिलन ने प्रशंसा की,’ ये… ये तो बहुत बड़ा काम कर रही आपकी संस्था।’
‘ मेरी नहीं, मिसेज़ काला की संस्था।’ पहली बार नीला ने हल्का विरोध जताया।
वे रसोई में आ गये थे। कुछ स्त्रियां रोटियां बेलने में जुटी थीं, कुछ तवे पर सेंकने में। कोई दाल में तड़का लगाने की तैयारी कर रही थी, कोई सब्ज़ी से भरी कड़ाही में कलछुल चला रही थी। कई औरतें टिफिन तैयार करने में मशगूल थीं। मिलन ने पूछा,’ ये टिफिन कहां जाता है? ‘
‘ कुछ सरकारी संस्थाएं हैं, जिनसे हमारा कॉन्ट्रैक्ट है, कुछ इंडिविजुअल भी मंगाते हैं।’
‘ गुड… वैरी गुड। काफी कुछ ऑर्गेनाइज्ड और डेडिकेटेड है साथिया!’ मिलन ने विदा लेते हुए पूछा,’आपने ये संस्था क्यों ज्वाइन की? मेरा मतलब सोशल वर्क को आपने करियर क्यों चुना?’
‘ सॉरी, ये करियर नहीं… कमिटमेंट है। यह मेरी अपनी पसंद है।’ छूटते ही नीला ने प्रतिवाद किया।

अगले दिन ‘नई ख़बर’ में ‘साथिया’ के बारे में विस्तृत स्टोरी छपी थी। ‘साथिया’ की उपलब्धियों, समाज की उपेक्षित स्त्रियों के प्रति उसकी पहल के बाबत बताते हुए मिलन ने नीला के नाम का कई बार उल्लेख किया था। नीला की जगह कोई और लड़की होती तो मिलन को धन्यवाद देती, लेकिन नीला तो फोन कर उसे झाड़ने लगी थी,’ आपको मेरा नाम कोट करने की क्या ज़रूरत थी?’
‘ सारी जानकारी आपने दी, तो क्रेडिट भी तो आपको ही जाना चाहिए।’ मिलन ने दलील दी।
‘ मिसेज़ काला को अच्छा नहीं लगेगा।’ नीला का विरोध हल्का पड़ा था, आवाज़ का अंदाज़ बता रहा था।
‘ आप मिसेज़ काला से डरती हैं?’
‘ डरती तो मैं अपने बाप से भी नहीं।’ नीला लगभग गुर्रा पड़ी थी,’ मिसेज़ काला की रेस्पेक्ट करती हूं, इसका मतलब यह नहीं कि मैं डरती हूं।’
दूसरी ओर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। उसने कई बार ‘हेलो…हेलो’ किया, लेकिन कोई ज़वाब नहीं मिला। उसे एकबारगी गुस्सा आया, ‘अजीब आदमी है, बगैर बोले फोन काट दिया।’
मिलन ऐसा ही था। अनप्रेडिक्टेबल। उसे धीरे-धीरे ही समझ पाई थी नीला। एक शाम जब वह उसके ऑफिस कोई प्रेस रिलीज लेकर पहुंची थी, उसने छूटते ही टोका,’आप क्यों आईं, किसी से भिजवा देतीं।’
नीला उसे कैसे बताये कि वह प्रेस रिलीज के बहाने उससे मिलने आई है। वह जबतक कोई सफाई देती, मिलन ने आग्रह किया,’आइये, कॉफी पीते हैं।’
उसे कुछ कहने का अवसर दिये बगैर मिलन कैफ़ेटेरिया की ओर चल पड़ा। यह ‘नई ख़बर ‘ का हॉलनुमा कैफेटेरिया था, जिसके एक कोने की टेबल पर वे दोनों आकर आमने-सामने बैठे गये थे। जबतक कॉफी आती मिलन ने राज़दाराना लहज़े में पूछा,’ मिसेज़ काला ने उस दिन आपको कुछ कहा तो नहीं?’
‘कहा तो कुछ नहीं, लेकिन उनके चेहरे से नाख़ुशी साफ़ झलक रही थी।’ नीला बेफिक्री से हंस पड़ी।
‘ उन्होंने अपनी नाराज़गी मुझसे जाहिर की थी।’ मिलन ने हंसी उड़ाने के अंदाज़ में बताया,’ बोल रही थी, साथिया को खड़ा करने में मैंने कितने पापड़ बेले हैं,कितनी मुश्किलों से गुजरी हूं, दिन-रात एक किये हैं। वह किसी को नहीं दिखता। बस, सबको इसकी कामयाबी दिखती है। देखिए, कि जुम्मा-जुम्मा पांच महीने से आई इस लड़की ने ऐसे श्रेय लिया जैसे उसी ने ‘साथिया’ को यहां तक पहुंचाया हो।’
‘ कह तो वह ठीक ही रही थीं। उनकी नाराज़गी जायज़ थी।’ नीला मुस्कुराई।
‘ नीला जी, सोशल वर्क से जुड़ा कोई व्यक्ति इतना संकीर्ण कैसे हो सकता है? अगर आपमें अपने साथियों के प्रति सम्मान नहीं, आपके अंदर उदारता नहीं, सहचर भाव नहीं, तो यह ‘सोशल वर्क’ ढकोसला के सिवा और कुछ नहीं।’ मिलन के स्वर में असहमति की नाराज़गी थी।
कॉफी आ गई थी। दोनों के बीच चुप्पी तिर आई। कॉफी सिप करते नीला ने अपने भीतर मिलन के ख्यालों को घुलता हुआ महसूस किया। अरसे बाद, कोई शख्स बिल्कुल उस तरह सोच रहा था, जिस तरह वह सोचने की क़ायल रही है। उसने तलाशती आँखों से मिलन को देखा। मिलन की आँखें उस पर आ कर टिक गईं,’ वैसे मिसेज़ काला हैं एक नंबर की पाखंडी औरत। शायद आपको पता नहीं, कि वह सरकार से बड़ा फंड तो हासिल करती ही हैं, रिस्क्यू की गई लड़कियों के उद्धार के नाम पर भी मोटी कमाई करती हैं।’
नीला की आँखें फैल गईं। मिलन की बात पर यकीन करना मुश्किल था, उसे विस्मय से देखती पूछ बैठी,’मतलब?’
‘ मतलब यह कि ‘साथिया’ में माया नाम की एक लड़की किसी कोठे से रिस्क्यू कर लाई गई थी। उससे दिल्ली का एक लड़का शादी करना चाहता था। वह यहां आया, मिसेज़ काला उस लड़के की सारी जानकारी लेकर आश्वस्त हुईं। फिर माया और उस लड़के की आमने-सामने बात कराई गई। माया ने उस लड़के से बात कर, उसकी सच्चाई से प्रभावित होकर उससे शादी करने की अपनी सहमति दे दी, लेकिन दोनों की शादी नहीं हो पाई।’
‘ कहीं उस लड़के का नाम सुदेश तो नहीं था?’ नीला ने कुछ याद करते हुए पूछा।
‘ हां, उसका नाम सुदेश था। आपको ये वाक़या पता है?’
‘ हां, सुदेश और माया एक दूसरे से शादी के लिए तैयार थे। लेकिन सुदेश एकदम से ग़ायब हो गया था। न वह लौटकर आया, न उसकी कोई ख़बर मिली। मिसेज़ काला ने ज़रूर बताया कि वह फ्रॉड था। माया बाल-बाल बच गई थी।’ अपनी स्मृति पर ज़ोर देते हुए नीला ने रहस्योद्घाटन-सा किया।
‘ नहीं, सुदेश फ्रॉड नहीं था, फ्रॉड हैं मिसेज़ काला ।’ मिलन ने तीखे स्वर में आपत्ति जताई,’ मिसेज काला ने माया का उद्धार करने के नाम पर सुदेश से पचास हज़ार मांगे थे। सुदेश इतने पैसे देने की स्थिति में नहीं था। वह लड़का किसी सरकारी कार्यालय में चपरासी है। वह माया से शादी कर आदर्श स्थापित करना चाहता था। लेकिन अफ़सोस कि मिसेज काला ने पैसे न मिलने के कारण उनकी शादी से साफ इनकार कर दिया था।’
कॉफ़ी की अंतिम घूंट ज़्यादा कड़वी थी। नीला के भीतर तक कड़वाहट की लहर फैल गई,’ तुम्हें यह सब कैसे मालूम?’
‘सुदेश मेरे एक स्टाफ का कजिन है। ‘साथिया’ पर छपी मेरी रिपोर्ट देखकर वह स्टाफ मुझसे मिलने आया और फिर उसने ये सारी बात बताई।’ मिलन के चेहरे पर अफ़सोस का भाव था,’जानती हो, मेरे उस स्टाफ ने अपने उलाहने से मेरी उस रिपोर्ट की क्रेडिबिलिटी की धज्जी उड़ा दी। पहली बार मैं स्वयं के काम से शर्मिंदा हुआ।’
अप्रत्याशित उपस्थित हो आई इस परिस्थिति के बीच नीला को किस तरह प्रतिक्रिया देनी चाहिए, समझ नहीं आ रहा था। पता नहीं किस भावना के वशीभूत उसने अपना हाथ मिलन की हथेली पर रख दिया। संभवतः अपनी मनःस्थिति को संयत करने का उपक्रम था, तल्ख़ी को थिराने के लिए दिया गया सहारा था, या कि अपने कमज़ोर हो आये यक़ीन को बचाने का उपक्रम। मिलन ने मुस्कुराकर नीला को देखा और अपने दूसरे हाथ से नीला की हथेली को थपथपाया। यह सब एक अत्यंत मौन के बीच घटा था। वे दोनों बिना कुछ कहे-सुने उठे और एक-दूसरे से विदा लिया।
वह रात नीला ने आँखों में काटी …अंधेरे की अंतहीन राह में भटकते हुए उसने स्वयं को उस मोड़ पर पाया, जिसके आगे कोई राह नहीं थी। हठात उसने पीछे मुड़कर देखा, मिलन खड़ा था। यह फ़ैसले का क्षण था। उसने आँखें मूंदकर गहरी सांस भरी थी।

‘ तो अब तुम क्या करोगी सोचा है?’ अपनी दाढ़ी खुजाते मिलन ने नीला की ओर जिज्ञासा से देखा।
‘ सुनो, मैं कुछ भी सोचकर नहीं करती। प्लानिंग मेरे वश की बात नहीं।’ नीला की आँखें चाय के कप से उठती भाप के आरपार भेद रही थीं,’ जो भी करूंगी अपने मन का करूंगी।’
‘ बिल्कुल ऐसा ही होना चाहिए!’ संक्षिप्त उत्तर दिया मिलन ने।
‘ जल्दी में हो?’ मिलन की तटस्थता से हड़बड़ाकर पूछा।
‘ अरवल काण्ड की फॉलोअप स्टोरी सब्मिट करनी है, जाना पड़ेगा।’ मिलन उठ गया।
‘ फ़िलहाल मैं फ्री हूं… मौका मिले तो घर आ जाना। खाना साथ खायेंगे।’ नीला ने रेस्टोरेंट से निकलते हुए बेतकल्लुफ़ी का इज़हार कर दिया था।
मिलन रात नौ बजे आया। बारिश में भीगते हुए। नीला तौलिया देते हुए बोली,’ बारिश रुक जाती तो आते!’
‘ खामख्वाह तुम्हें इंतज़ार करना पड़ता।’
‘ किसी हमख्याल का इंतज़ार चाहे कितना भी लंबा हो, इंतज़ार मुश्किल नहीं लगता।’ ये बात नीला ने बेखयाली में कतई नहीं कही थी।
यह रात नीला और मिलन के ख्यालों के खुलने की रात थी। बाहर बारिश तेज़ हो गई थी,अंदर जज़्बात।
‘नीला, तुम अकेली रहती हो?’
‘हां!’
‘क्यों?’
‘अकेले रहना मैंने ख़ुद चुना है।’ नीला ने बगैर किसी हिचक के कहा।
‘तुम्हारे माता पिता… भाई, बहन?’
‘ मुझे अपनी ज़िंदगी में किसी की दखलअंदाज़ी पसंद नहीं।’
मिलन चुप हो गया। उसकी चुप्पी में कोई काँटा नहीं था। कोई चुभन नहीं थी। कोई सफाई की तलब भी नहीं थी। नीला को अच्छा लगा कि मिलन ख़ुद को थोपने के कॉम्प्लेक्स से मुक्त है। उसकी चुप्पी को छूकर पूछा,’ तुम उड़ीसा से हो,फिर यहां इतनी दूर कैसे आ गये?’
‘ नौकरी की वज़ह से।’ मिलन रहस्यमय अंदाज़ में मुस्कुराया।
‘ लगता तो नहीं कि तुम फकत नौकरी के लिए यहां आये हो?’ नीला ने उसकी मुस्कुराहट को भेदने का प्रयास किया।
‘ नीला, मन का काम जहां मिले जाना चाहिए। मैं भी इसी काम के लिए यहां आया।’ मिलन की हल्की-सी हंसी कमरे में पहली हलचल थी।
बारिश जब थमी, मिलन जाने को हुआ तो नीला ने कहा,’ काफी रात हो चुकी है। चाहे तो रुक सकते हो।’
‘ शुक्रिया !’ मिलन ने जाते हुए कहा।
बारिश से नम हो आई रात और आसमान में ठहरे बादलों के बीच अंधेरा थरथरा रहा था। मिलन का साया देखते-देखते आँखों से ओझल हो गया था।

नीला और मिलन को साथ रहते महीनों गुजर गये थे। नीला ने मिलन को रोका या मिलन ख़ुद नीला के पास रुका, इससे बड़ी बात यह थी कि दोनों ने इस सहजीवन को सहजता से स्वीकार लिया था।
इस सहजीवन से बहुत पहले मिलन ने एक बार पूछा था,’ नीला, तुमने कभी अपनी शादी के बारे में क्यों नहीं सोचा?’
ठहाका लगाकर हंस पड़ी थी नीला। यह हंसी उड़ाती हंसी थी। मिलन उसको देखता रहा था गोया उसकी इस हंसी के भीतर कुछ तलाश रहा हो। नीला हंसी से बाहर एकदम संज़ीदा हो आई थी।
‘ प्यार भी किया…शादी का भी सोचा, लेकिन कुछ भी मुमक़िन न हुआ। साला, प्यार के नाम पर फ़रेब, शादी के नाम पर सौदेबाज़ी। घृणा हो आई इस तमाम फ्रॉड से।’
मिलन ने न टोका, न कुरेदा। चुपचाप उसके सामान्य होने की प्रतीक्षा करता रहा। नीला गहरी सांस अंदर खींचते हुए ख़ुद को संयमित करती रही। सहसा मिलन उठा और किचन में चला गया। लौटा तो उसके हाथ में चाय के दो कप थे। चाय का कप लेते हुए नीला मुस्कुराई,’ यू आर अ परफेक्ट कंपेनियन। ‘
‘ नो… नो वन इज़ परफेक्ट। मी टू।’ मिलन ने टोका,’ यह एक्सपेक्टेशन ही ग़लत है।’
‘ हां, तुम सही कह रहे हो, यह एक्सपेक्टेशन ही हमें छलता है। मैंने भी विजय से ऐसे ही एक्सपेक्टेशन किये थे। उस वक़्त प्यार में, प्यार के उन्माद में, प्यार के अलावा कुछ भी सोच पाना कहां मुमक़िन हो पाता है?’ नीला स्मृतियों के छूट गये किसी सिरे को पकड़ने की कोशिश कर रही थी,’मैं विजय के प्रेम में ऐसे ही पागल थी। उसकी बातें, उसका साथ, सबकुछ इतना रोमानी था, इतना पुरकशिश कि उससे परे सोचना भी बेमानी लगता। हमने सेटल होने के बाद शादी करने का फ़ैसला किया था। कॉलेज के बाद विजय ने यूपीएससी की तैयारी शुरु की, मैंने सोशल एंड वेलफेयर वर्क्स में एडमिशन ले लिया। लेकिन यूपीएससी में सेलेक्ट होने के बाद तो विजय का तेवर ही बदल गया। वह मुझसे कटने लगा। मिलना तो मिलना, उससे बात करना भी मुहाल हो गया। आख़िरकार, एक दिन मैंने उसे उसके घर जाकर पकड़ा। वह आँखें मिलाने से बचता रहा। बहुत ज़ोर देने पर उसने ज़वाब दिया,’ घर वालों ने मेरी शादी तय कर दी है।’
‘ मुझसे प्रेम तुमने घर वालों से पूछकर किया था?’ मैं आपा खो बैठी।
वह किसी निरीह-सा चुप था। उसकी इस बेशर्मी ने मुझे बेतरह भड़का दिया,’ विजय, तुम ऐसा नहीं कर सकते। मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूंगी।’
‘ क्या करोगी तुम?’ उसने ढिठाई दिखाई।
‘ तुम्हारी शिकायत पुलिस में करुंगी…तुम्हारा करियर बर्बाद कर दूंगी। ‘
‘ जो मन आये करो। लेकिन याद रखना, मैं आइएएस हो चुका हूं। कोई तुम्हारी बात नहीं सुनेगा।’ यह विजय नहीं, उसका दम्भ बोल रहा था। जिसे जी-जान से चाहा, उसे पहचानने में इतना बड़ा धोखा! यक़ीन नहीं हो रहा था, लेकिन एक विकृत सच मेरे सामने था। मैं कसमसा कर रह गई। मुझे विजय के सामने याचक होना मंज़ूर न हुआ। मेरा स्वाभिमान फुंफकार उठा था। मन में उठ रहे ज्वार-भाटे को जबरन रोकती, मैं विजय की छाया से भाग छूटी थी।’
नीला के चेहरे पर उभर आई लकीरों में उसका दर्द नुमायां हो आया था। वह एकबारगी चुप हो गई थी, संभवतः अतीत से बाहर आने का जतन कर रही थी। कहे और अनकहे के बीच मौज़ूद यातना से छुटकारा इतना आसान भी कहां होता है? मिलन एकटक नीला की ओर देखे जा रहा था। नीला ने आंखें मूंद ली थीं, शायद नमी छुपा रही थी।
‘ मिलन, सच पूछो तो प्यार… विवाह…सबसे मेरा विश्वास उठा गया।’ नीला की आवाज़ कहीं दूर से आती जान पड़ी,’ मेरे माता-पिता ने मेरी शादी कहीं और कराने की पहल की। लेकिन मैंने मना कर दिया। ज़्यादा दबाव डालने पर मैंने बग़ावत कर दी। उनके रोज़-रोज़ के मेलोड्रामा से तंग आकर घर छोड़ दिया।’
नीला ने आँखें खोलीं। मिलन को ख़ामोश देख जैसे ख़ुद सफाई देने पर उतर आई,’ तुम बताओ,क्या करती? उनके थोपे रिश्ते को स्वीकार कर लेती? किसी भी ऐरे-गैरे के साथ लग लेती?’
मिलन का तवज्जो चाहती थी नीला, लेकिन नीला के मन में उमड़ रहे जज़्बात को छेड़ना उसे उचित नहीं जान पड़ा। लिहाज़ा,मिलन ने कोई ज़वाब नहीं दिया। नीला ने क्षण भर को मिलन की ओर किसी उम्मीद से देखा, लेकिन उसकी ओर से कोई प्रतिक्रिया ना मिलते देख,बोली,’ तुम समझते हो, मैंने कुछ ग़लत किया?’
‘ नीला,मै डिसिसीव नहीं हूं।’ इस बार मिलन ने नीला को गौर से देखा,’हर किसी को अपना फ़ैसला ख़ुद लेने का हक़ है।’
नीला ने संतोष की सांस ली। उसे ख़ुशी हुई कि मिलन उसे ग़लत नहीं समझता। वह मिलन की आँखों में झांकते हुए मुस्कुराई,’ मिलन, तुम मुझे पहले क्यों नहीं मिले?’
‘अभी कौन -सी देरी हुई है?’ मिलन ने चुहल की।

नीला ‘साथिया’ से अलग हो गई थी। इस बीच उसे एक फाउंडेशन की ओर से ग्रामीण महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक स्थिति पर विस्तृत अध्ययन के लिए प्रोजेक्ट मिल गया था। नीला मनपसंद काम मिलने से ख़ुश थी। दो साल तक कोई आर्थिक चिंता नहीं थी। वह अपने काम के लिए कमर कस के जुट गई थी। उसे रात-दिन हलकान होते देख एक सुबह मिलन ने छेड़ा था,’तुम थकती नहीं हो?’
‘ ज़िंदगी से थक चुकी स्त्रियों से मिलकर अपनी थकान भूल जाती हूं। मुझे लगता है,उनके सामने मेरी थकान बहुत मामूली है।’ मिलन की चिंता को नीला ने मुस्कुराकर झटक दिया,’ यक़ीन मानो मिलन, मैं जिन स्त्रियों से मिलती हूं, उन्हें देखकर कोफ़्त होती है, कि हमने कैसा समाज बनाया हुआ है। सच पूछो तो, ऐसे समाज पर शर्म आती है।’ नीला के स्वर में आई तुर्शी उसके भीतर ज़ब्त तल्ख़ी का इज़हार थी।
‘ नीला, दुनिया के तमाम समाजों में असमानता और शोषण रहा है, लेकिन जिन समाजों ने इनके विरुद्ध संघर्ष किया, वे एक बेहतर और समानता पर आधारित समाज बनाने में सफल हुए। हमारी दिक्कत यही है कि हम अफ़सोस तो ज़ाहिर करते हैं, लेकिन इसे बदलने के लिए सिर्फ किताबी बातें करते हैं।’
मिलन ने सहज ही अपनी राय व्यक्त की थी, लेकिन नीला को जैसे नागवार गुजरा,’ मिलन, समस्याओं का गहरा अध्ययन किये बिना, उनके कार्य-कारणों को समझे बिना, उनका विश्लेषण किये बिना, बदलाव की कोई पहल संभव नहीं। मैं जब ऐसी स्त्रियों के जीवन को क़रीब से देख रही हूं, तभी मैं इस सच्चाई को शिद्दत से समझ पा रही हूं। यक़ीन मानो, प्रोजेक्ट ख़त्म होते ही मैं इन स्त्रियों के जीवन में बदलाव के लिए कुछ अवश्य करुंगी।’
नीला ने मिलन के तंज की काट रखते हुए अपनी भावी योजना का भी संकेत दे दिया था। मिलन और नीला एक-दूसरे के प्रति केयरिंग थे। व्यक्तिपरकता के बजाय समाज और सामूहिकता की सोच उन्हें वैचारिक स्तर पर भी उनके रिश्तों को मज़बूत करती थी। कई मामलों में दोनों में असहमतियां भी थीं, लेकिन वे एक-दूसरे की असहमतियों का सम्मान भी करते थे। वे एक दूसरे को बांधने के हिमायती नहीं थे। यही वज़ह थी कि जब नीला ने अपने प्रेग्नेंट होने की सूचना मिलन को दी तो उसका उड़ा चेहरा देखकर खुलकर हंस पड़ी,’ मिलन, मैं तुम्हें बांधूँगी नहीं। इसके लिए हमें कोई अपराधबोध पालने की ज़रूरत नहीं है। ‘
‘ आर यू श्योर?’ मिलन का गला सूख गया था,’ यह जानते हुए भी कि हम शादीशुदा नहीं हैं?’
‘ हमारे बीच ऐसी कोई शर्त तो नहीं थी?’ नीला ने ज़ोर देकर कहा।
नीला के मन में कोई हिच नहीं थी, कोई अफ़सोस नहीं था। लेकिन मिलन के चेहरे पर एक स्याह साया घिर आया था। उसे फक देख नीला उसके क़रीब आ गई ,’ मिलन, तुम शायद इस अप्रत्याशित के लिए तैयार नहीं हो। इस वज़ह से गिल्ट में हो?’
‘ नीला, सवाल गिल्ट का नहीं, सवाल उस ज़िम्मेदारी का है, जिसके लिए मैं अभी तैयार नहीं। ‘
‘ मिलन, डोंट वरी, मैं सब संभाल लूंगी।’ नीला ने मिलन के मन का बोझ हल्का करना चाहा,’ यह मेरी ज़िम्मेदारी है।’
यह एक बेहद कठिन समय था। नीला का यह निर्णय स्वीकार करने में मिलन को काफ़ी समय लगा। जिस दिन नीला ने बच्ची को जन्म दिया, मिलन दिन-रात उसकी देखभाल में लगा रहा। नीला अपनी बेटी को देखकर निहाल होती रही। मिलन को अपने पास बुलाकर बोली,’ बेटी का नाम मैंने सोच लिया है?’
‘ नाम? इतनी जल्दी?’ मिलन उत्सुक दिखा।
‘ जल्दी कहां? बहुत पहले से सोच रखा था।’ नीला मुस्कुराई।
‘अच्छा, क्या नाम सोचा है?’
‘ मिनी… मिलन और नीला के प्रथमाक्षर।’ नीला प्रेम में डूबी हुई पहलीबार इस क़दर भावुक दिख रही थी। उसने इसी भावना के वशीभूत मिलन की हथेली कसकर थाम ली थी।

वही मिनी एक ऐसी यात्रा पर निकलने वाली थी, जिसके रास्ते का पता नहीं था, जिसके गंतव्य का ठिकाना नहीं था। बस एक उम्मीद थी और उस उम्मीद में हज़ारहा सवाल थे…हज़ारहा किन्तु-परन्तु. थे। फिर भी उसने फ़ैसला कर लिया था कि वह उनसे मिलने जायेगी। उनसे, जिसकी धुंधली छवि उसकी आँखों में आज भी जमी हुई है। एक दाढ़ी वाला शख्स जो घर में घुसते ही उस नन्ही जान को अपनी बाहों में उठाता और बेतहाशा चूमने लगता। वह उस शख्स के कंधे को अपनी गदबदी हथेलियों से जकड़ लेती। उसका वह स्पर्श अपनी आत्मा में महसूस करते हुए वह आज भी रोमांचित हो जाती है। यह सबकुछ जस का तस उसकी आँखों में तिरता रहता है। जबतक वह ठीक से कुछ समझने के क़ाबिल नहीं हुई, तबतक बेचैन रही, बगैर जाने कि इस बेचैनी क़ा क्या मतलब है? और जब उसे इस बेचैनी क़ा कारण समझ आया, तब से उस छवि की शिनाख़्त वह पिता के रूप में करने लगी है। उनका वह चूमना, उनका वह स्पर्श, उनके कंधे पर टिका उसका हाथ। सब उसे इतने आत्मीय लगते कि वह उन्हें फिर-फिर छूने, पाने को उद्धत हो जाती है। इन्हीं मनःस्थितियों में उसने ज़िद पकड़ ली थी,’ हू वाज़ ही? क्या नाम था उनका?’
‘ मिलन।’ नीला ने थोड़ी पीड़ा, थोड़ी हसरत के साथ बताया,’ मिलन दास नाम था। वह तुम्हारे जन्म के दो साल बाद ही छोड़कर चला गया।’
‘ तुमने जाने दिया?’ मिनी के मासूम चेहरे पर अविश्वसनीय हैरानी थी,’ तुमने रोका नहीं?’
सीधा सवाल बेहद कठिन था। नीला की आँखों में पुरानी यादों के कई अक्स उतराते-उमड़ते चले आये,’ मिनी, हमने कभी एक दूसरे को बांधा नहीं। मिलन का जाना ज़रूरी था। उसे मैं कैसे रोकती?
‘ अपने लिए नहीं, मेरे लिए तो रोक सकती थी? ‘ एक और दुरूह सवाल।
‘ यह तो उसे सोचना चाहिए था न? ‘ सवाल के ज़वाब में सवाल।
एक मुख़्तसर ख़ामोशी गोया दोनों कोई अदृश्य सिरा पकड़ने में मुबतिला थीं। आख़िर मिनी ने मनुहार के लहजे में पूछा,’ हुआ क्या था? क्यों छोड़ गये वो?’
नीला ने क्षण भर को पलकें मूंदीं। बीते दिनों को ठीक-ठीक पकड़ने में स्मृतियों के बिम्बों को एक साथ जोड़ते हुए किरचों की चुभन आँखों में तिर आई,’ मिलन की मां बीमार थी। वह उन्हें देखने के लिए भुवनेश्वर गया। उसका पत्र आया, मां की देखभाल के लिए मेरा यहां अभी रहना ज़रूरी है। कुछ दिनों बाद उसका दूसरा पत्र आया, नीला, मुझे यहां एक अख़बार में नौकरी मिल गई है। मां के लिए यहां रुकना ज़रूरी है, इसलिए नौकरी जॉइन कर ली है। मिनी, मेरे पास उसे रोकने का कोई कारण नहीं था। उसका आख़िरी ख़त आया था, जिसमें उसने लिखा था, यहां के आदिवासियों के ख़िलाफ़ माफियाओं का षड्यंत्र चल रहा है, मैं उसे उजागर कर रहा हूं… कह नहीं सकता, यह लड़ाई कितनी लंबी चलेगी। ‘
नीला ने अपनी बात ख़त्म करते-करते ख़ुद को उस मोड़ पर पाया, जहां वह अपनी बेटी के सामने अपनी सफाई पेश कर रही हो। मिनी ने उसकी मनःस्थिति को महसूस किया। तुरंत उसे बाहों में भर कर लाड़ जताया,’ मॉम, मैं समझ सकती हूं। आपका स्वाभिमान। आई प्राउड ऑफ यू, मॉम।’
नीला ने भी मिनी को अंकवार में भर लिया। बोली कुछ नहीं, लेकिन मिनी का विश्वास पाकर उसके मन का बोझ उतर गया था।

भुवनेश्वर पहुंचकर मिनी सीधे मिलन के उस अख़बार के कार्यालय पहुंची, जिसका जिक्र उसने नीला को लिखे पत्र में किया था। वहां काम करने वाले लोगों ने मिलन के बारे में अनभिज्ञता जताई। मिनी को सहज ही विश्वास नहीं हुआ। उसने आस भरे स्वर में एक नौजवान पत्रकार जय पात्रा से अनुरोध किया,’ आप पत्रकार हैं। प्लीज़, मुझे मेरे पिता को खोजने में मदद कीजिए!’
जय पात्रा उत्साही पत्रकार था, मिनी के आग्रह को स्वीकार कर उसके साथ हो लिया,’ देखिए, जब से यह अख़बार कॉर्पोरेट हुआ है, पुराने लोग या तो छोड़ गये या उनकी छंटनी हो गई। कुछ पुराने पत्रकारों को मैं जानता हूं। शायद उनमें से किसी को पता हो। चलिए, आपको उनसे मिलवाता हूं।’
उम्मीद की किरण जागी। मिनी जय पात्रा के साथ चल पड़ी। एक लम्बी दूरी तय कर वे जिस बुजुर्ग पत्रकार के पास पहुंचे, उनका नाम था-प्रभात पटनायक । प्रभात पटनायक लगभग पैंसठ साल के अनुभवी पत्रकार थे। रिटायरमेंट के बाद वह अपने पत्रकारिता के अनुभवों पर आधारित कोई पुस्तक लिख रहे हैं। कभी-कभार कुछ अख़बारों के लिए सामयिक विषयों पर लेख भी लिखते हैं। उड़िया टीवी चैनलों पर बतौर विशेषज्ञ भी बुलाये जाते हैं। मिनी से यह जानकर कि वह मिलन दास को तलाश रही है, वह उससे मिलना चाहती है। प्रभात पटनायक ने सहज जिज्ञासावश पूछा,’तुम उससे क्यों मिलना चाहती हो?’
‘ वह मेरे पिता हैं।’ बेझिझक मिनी ने ज़वाब दिया।
‘ तु… तु… तुम… मिलन की बेटी हो?’ प्रभात पटनायक की आँखें आश्चर्य से फैल गई थीं।
मिनी ने ‘हां’ में अपनी गर्दन हिलाई। प्रभात पटनायक ने पहलू बदलते हुए मिनी को गौर से देखा। सामने बैठी एक मासूम, लेकिन अपने पिता की तलाश में निकली, इस लड़की के साहस से वह चमत्कृत दिखे,’ बेटा, मिलन एक बहुत साहसी पत्रकार था। आम आदमी की समस्याओं, मुश्किलों और उनके संघर्ष के प्रति संवेदनशील था। शोषित, वंचित, पीड़ित जन के पक्ष में खड़ा वह एक निर्भीक आवाज़ था। उसने गांजिम ज़िले के आदिवासियों के शोषण को लेकर एक खोजी रिपोर्ट लिखी थी। इसमें उसने उस इलाके के दलालों के साथ मिलकर कुछ बड़े पूँजीपतियों द्वारा आदिवासियों की ज़मीनें हड़पने के मामले का ख़ुलासा किया था। यह रिपोर्ट अख़बार ने छापने से मना कर दिया। इससे मिलन भड़क गया। उसने संपादक से रिपोर्ट न छापने का कारण पूछा, तो संपादक ने कुछ भी स्पष्ट बताने से इनकार कर दिया।’
प्रभात पटनायक क्षण भर को रुके, मिनी की सांसें टंगी रहीं, गोया वह कोई जादुई-कथा सुन रही हो। जय पात्रा भी यह कहानी सुनते हुए चकित था, कि कोई पत्रकार ऐसा भी था, जो अपने संपादक से सवाल भी कर सकता था। प्रभात पटनायक ने अपनी बात ज़ारी रखी,’ मिलन ने जब संपादक से अपनी रिपोर्ट वापस मांगी तो उसने देने से इनकार कर दिया। बस क्या था… गुस्से में तिलमिलाये मिलन ने उसी वक़्त संपादक की लानत-मलामत कर डाली। उसे पूँजीपतियों का दलाल और ग़रीब, आदिवासियों का विरोधी बताकर उसका मज़ाक उड़ाया। संपादक ने मिलन को कुछ समझाना चाहा, लेकिन गुस्से में वह उसके चैम्बर से बाहर निकल गया। मिलन के इस रौद्र रूप से पूरे संपादकीय विभाग में सनसनी व्याप गई थी। इस हाई वोल्टेज माहौल के बीच मिलन ने अपना इस्तीफा दे दिया। उसी झोंक में वह अपना शांति निकेतनी थैला संभालता तूफ़ान की तरह अख़बार के कार्यालय से बाहर निकल गया।’
अचानक माहौल में एक अबोला सन्नाटा छा गया था। प्रभात पटनायक ख़ुद को संयत करने की कोशिश कर रहे थे। जय पात्रा के चेहरे पर उलझन की अनगिनत सलवटें थीं। मिनी की उत्सुकता चरम पर थी, उसने तपाक से पूछा ,’ सर, इतना सब कुछ आपको कैसे मालूम है? क्या मिलन दास आपके गहरे मित्र थे?’
‘ नहीं बेटा, मिलन मेरा दोस्त नहीं था। मैं यह सब इसलिए जानता हूं कि मैं ही उसका संपादक था।’ प्रभात पटनायक जैसे अपराधबोध से शर्मिंदा थे,’ मैं उस वक़्त अपनी कुर्सी से बंधा था। उसकी रिपोर्ट न छापने का दबाव मुझ पर मैनेजमेंट ने बनाया था। मिलन की वह रिपोर्ट जिन पूँजीपतियों को एक्सपोज़ कर रही थी, वे हमारी कंपनी के मालिक के रिश्तेदार थे। इसीलिए मुझे उनका सख़्त आदेश था कि न रिपोर्ट छापी जाये, न वापस की जाये।’
प्रभात पटनायक जैसे मिनी की अदालत में कंफेस करके स्वयं को पापमुक्त करना चाह रहे थे,
‘ मिनी, ये उन दिनों की बात है, जब अख़बारों का चरित्र बदल रहा था। काली पूंजी मीडिया में पंप हो रही थी। पत्रकारिता मैनेजमेंट की चाकरी करने को बाध्य थी। संपादक पत्रकार नहीं, मैनेजर हो गये थे। मैं भी उसी ज़मात का हिस्सा था। मुझे अफ़सोस है, मैं उस वक़्त मिलन के साथ नहीं खड़ा हो पाया।’
मिनी की समझ में नहीं आ रहा था, कि वह प्रभात पटनायक को क्या कहे? पछतावे की शर्मिंदगी में डूबे इस बुजुर्ग के प्रति मन में सहानुभूति जाग उठी। उसने विनम्र लहज़े में गुज़ारिश की,’सर, मिलन… मेरे पापा के बारे में कोई जानकारी हो तो बतायें? वह कहां हैं? कैसे मिल सकते हैं?’
प्रभात पटनायक की आँखें छत पर जा टिकीं, वह खोये-खोये स्वर में बोले,’ सुना था इस्तीफे के बाद मिलन छतरपुर चला गया। वहां उसकी मां थी। उसके बाद उसकी कोई ख़बर नहीं मिली। यकीन मानो, उसके बारे में मुझे कुछ नहीं पता।’
मिनी भावुक हो आई थी। उसकी आँखों की कोरों पर नमी थी।
प्रभात पटनायक के घर से निकलकर जय पात्रा ने पूछा,’ अब क्या करेंगी आप ?’
‘ मैं छतरपुर जाऊंगी!’ मिनी ने दृढ़ स्वर में ज़वाब दिया।
‘ मैं चलूं आपके साथ?’ जय पात्रा ने स्वतः स्फूर्त प्रस्ताव रखा।
‘ रियली?’
‘ हां, क्यों नहीं? आपकी मदद करके मुझे ख़ुशी होगी।’ जय पात्रा स्वभावतः सहयोगी भाव से भरा था।

छतरपुर पहुंचते-पहुंचते मिनी और जय पात्रा खुल चुके थे। उनके बीच औपचारिकता की दीवार ढह गई थी। वे रास्ते भर एक-दूसरे के बारे में जानते-पूछते रहे। जय पात्रा उड़िया में कविताएं भी लिखता है, यह जानकार मिनी को हैरानी हुई। उसने मासूमियत से पूछा,’ कविता कैसे लिख लेते हो? आय मीन ये तो गॉड गिफ्टेड होता है ना?’
‘ गॉड गिफ्टेड नहीं… हमारी संवेदना किसी चीज़ को लेकर कितनी घनीभूत होती है उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति है कविता।’ जय पात्रा ने कोई परिभाषा दुहरा दी।
मिनी जय पात्रा से प्रभावित दिखी,’ तुम बहुत अच्छे हो!’
‘ तुम बहुत साहसी हो। इतनी दूर चली आई अपने पिता की तलाश में ।’ जय पात्रा ने उसी अंदाज़ में मिनी की सराहना की।
‘ तुम कह रहे थे, यहां कोई तुम्हारी पहचान का है?’
‘ हां, एक लोकल रिपोर्टर है रितेश, शायद वह हमारी मदद कर पाये।’
जय पात्रा ने जेब से मोबाइल निकालकर रितेश का नंबर लगाया। दूसरी ओर से ज़वाब मिलते ही उसने रितेश से मिलने का आग्रह किया। बमुश्किल दस मिनट बाद ही रितेश आ पहुंचा। जय पात्रा से गले मिलकर उसने आत्मीयता ज़ाहिर की। जय पात्रा ने मिनी से परिचय कराते हुए कहा,’ रितेश ये लड़की बहुत दूर से आई है अपने पिता की तलाश में। तुम्हें इसकी मदद करनी है।’
रितेश ने देखा, मिनी उसकी तरफ बड़ी उम्मीद से देख रही थी। रितेश कोई ज़वाब देने के बजाय अपने मोबाइल से किसी को कॉल लगाने लगा। कॉल लगते ही उसने पूछा,’ गुरु जी,आपने एक बार मिलन दास के बारे में बताया था। हां… हां, वही गुरु जी । उनसे कैसे मिलना हो सकता है ? बहुत अर्जेन्ट है गुरु जी, प्लीज़,आप ही कुछ कर सकते हैं।’
मोबाइल पर बात ख़त्म कर रितेश ने बताया,’ गुरु जी इस इलाके के गांधीवादी नेता हैं। मिलन दास को जानते हैं। वह मिलन दास से बात करके कॉल करेंगे।’
रितेश दोनों को लेकर एक रेस्टोरेंट में आया। चाय ख़त्म होते न होते गुरु जी का कॉल आ गया। दूसरी ओर की बात सुनते हुए रितेश के चेहरे पर कई तरह के भाव आते-जाते रहे। अंत में कॉल कट कर वह जय पात्रा से मुख़ातिब हुआ,’ मिलन दास मिलने को तैयार हो चुके हैं। लेकिन हां,मैंने गुरु जी को यह नहीं बताया है कि मिलन दास से उनकी बेटी मिलने आई है।’
‘ रितेश, मिलना तो है। बोलो कहां चलना होगा ?’ जय पात्रा ने जानना चाहा।
‘ मोहाडा। यहां से पच्चीस-तीस किलोमीटर होगा।’ रितेश ने बताया।
‘ तब तो हम मोटरसाइकिल से जा सकते हैं।’ जय पात्रा ने मिनी की ओर मुख़ातिब होकर कहा।
मिनी थोड़ी हिचकिचाई,’ लेकिन तुम थक चुके होगे!’
‘अरे नहीं, जब निकल पड़े तो निकल पड़े। बैठो,चलते हैं।’ जय पात्रा ने अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट करते हुए रितेश से पूछा,’ चलें?’
रितेश ने भी अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट कर ली थी।

मोहाडा पहुंचते ही मिनी की आँखों में चमक आ गई थी। सारी थकान काफूऱ हो चुकी थी। उसने जय पात्रा के कंधे पर हाथ रखकर कांपते स्वर में कहा,’ विश्वास नहीं हो रहा कि, मेरी तलाश पूरी हो गई!’
‘तुम्हारे विश्वास ने यह संभव किया है।’ जय पात्रा ने मिनी की हौसलाआफज़ाई की।
वे जिस घर के सामने रुके थे वह एक साधारण किस्म का आश्रमनुमा घर था। एक लंबे खुले बरामदे में सफ़ेद बालों-दाढ़ी वाला दरमियाने क़द का एक शख्स लकड़ी की कुर्सी पर बैठा जैसे उन्हीं की प्रतीक्षा कर रहा था। उन्हें उत्सुकता से देखता हुआ उठा और पास आकर जिज्ञासा की,’ गुरु जी ने भेजा है?’
‘ जी… जी।’ रितेश ने बताया,’ ये मेरे पत्रकार दोस्त हैं। भुबनेश्वर से आये हैं आप से मिलने। ‘
मिनी ने मुग्ध भाव उस शख्स को देखा, जो उसके पिता थे, जिनकी तलाश में वह इतनी दूर से चलकर आई है। जी में आया कि वह लपककर उनसे लिपट जाये, लेकिन उसके पांव थम गये थे। ज़ुबान चिपक गई थी। जज़्बात के अतिरेक में उसकी चेतना ठिठकी हुई थी। जय पात्रा ने मिनी की आँखों में झांका। मिनी ने ख़ुद को संयत किया। उसने कुछ कहना चाहा कि तभी मिलन दास बोल पड़े, ‘ अच्छे समय पर आये तुम लोग। आज यहां आसपास के गांव के लोगों की मीटिंग होने वाली है। ‘
‘ आप तो पत्रकार थे, फिर यहां क्या कर रहे हैं आप?’ मिनी उत्सुकता से भरी हुई थी। उसकी आवाज़ लरज रही थी।
मिलन दास ने मिनी को गौर से देखा। उनकी आँखें सिकुड़ी गोया उसे तौल रहे हों। मिनी उन्हें अपलक देखे जा रही थी। मिलन दास ने पूछा,’ तुम ट्रेनी हो ?’
मिनी ने मासूमियत में सिर हिलाया। मिलन दास मुस्कुराये। वे लोग बरामदे में आ गये थे। वहां पड़ी काठ की कुर्सियों की ओर बैठने का इशारा करते हुए मिलन दास ने आवाज़ लगाई,’ मुक्ति ,कुछ चाय-पानी का इंतज़ाम करो, मेहमान आये हैं।’
मिनी चौंकी, मुक्ति…कौन है ये मुक्ति? उसने मायूस निगाहों से जय पात्रा की ओर देखा। जय पात्रा शायद उसकी मनःस्थिति भांप गया था, लिहाज़ा उसने उसे चुप रहने का इशारा किया।
ऐन तभी मिलन दास मिनी की ओर मुख़ातिब हो आये थे,’ तुम पूछ रही थी, मैं यहां कैसे आ गया? तो, मैं पत्रकारिता से हारकर यहां आया। मुझे लगा, पत्रकारिता जब ग़रीब आदिवासियों के साथ खड़े होने के बजाय पूँजीपतियों, माफियाओं के साथ खड़ी हो, तो वहां रहने का कोई औचित्य नहीं है।’
उनकी आवाज़ मिनी के भीतर गूंज रही थी। उसे चुप देख मिलन दास ने बात ज़ारी रखी,’ मैं यहां आया इस संकल्प के साथ, कि आदिवासियों को अपने शोषण, उत्पीड़न के ख़िलाफ़ ख़ुद आवाज़ उठानी होगी। उन्हें अपनी लड़ाई ख़ुद लड़नी होगी। इसके लिए इन्हें तैयार करने के इरादे से आया और फिर यहीं का होकर रह गया।’
मिलन दास के चेहरे पर हल्की स्मिति पसर आई थी। जय पात्रा ने उन्हें टोका,’आपको कभी यहां से लौट जाने की इच्छा नहीं हुई?’
‘ नहीं, यह मेरा चुनाव था।’ मिलन दास के स्वर में दृढ़ता थी।
मिनी फिर चिंहुकी, मॉम भी तो यही कहती है, यह मेरा चुनाव था। उसने मिलन दास को दबी मुस्कुराहट के साथ निहारा। वह कह रहे थे,’जब मैं यहां आया, तब इलाके की स्थिति बहुत ख़राब थी। बाहरी लोगों ने शराब की भट्ठियां लगा कर आदिवासियों को नशे की लत डाल दी थी। आदिवासी अनपढ़ थे… नशे ने उनकी स्थिति दयनीय बना दी थी? बाहरी लोग इनकी ज़मीनें औने-पौने दामों में हड़प रहे थे। इनके पेड़ों को, ज़मीनों को गिरवी रखकर भारी ब्याज पर कर्ज़े दे रहे थे। उन हड़पी ज़मीनों को बिचौलिए, गुंडे बड़े पूँजीपतियों को बेच रहे थे। ये आदिवासी बिचौलियों, गुंडों और पूँजीपतियों की हवस का शिकार थे। इन्हीं के ख़िलाफ़ लिखी मेरी रिपोर्ट अख़बार ने छापने से मना कर दिया था। तब मैंने इन आदिवासियों को अपने अधिकार के लिए लड़ने को तैयार करने का फ़ैसला किया। लेकिन यह सब आसान नहीं था। गुंडों, बिचौलियों, शराब माफियाओं ने मेरे ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया। यहां के सीधे-सादे आदिवासियों को भड़काया कि मैं नक्सली हूं… मैं बाहरी हूं… मैं मिशनरी हूं। उन्हें क्रिश्चन बनाने आया हूं। पहले तो कुछ आदिवासी उनके झांसे में आ भी गये। लेकिन मैं जमा रहा। मेरी ज़िद देखकर, मेरा आचरण देखकर, मेरी बातें सुनकर कुछ लोगों को विश्वास हुआ, कि मैं उनकी बेहतरी चाहता हूं। धीरे-धीरे आसपास के कुछ गाँवों के लोग मेरी बातों को समझने लगे। मैंने उन्हें समझाया कि तुम्हारी जमीनें ये बाहरी लोग गैरकानूनी ढंग से हड़प रहे हैं। तुम्हें जानबूझकर कर्ज़े के जाल में फंसा रहे हैं। आदिवासी लोगों को बात समझ आने लगी। वे एकजुट होने लगे। इस एकजुटता का परिणाम हुआ, कि हमने आदिवासी गाँवों में कमेटियां बनाईं, जो अपने हक़ की लड़ाई के लिए हरदम तैयार रहतीं है। बाहरी लोगों, खासकर शराब माफिया, जंगल माफिया के गुंडों से मुकाबला करतीं।’
‘ यह आपका पत्रकारिता से बदला था?’ जय पात्रा ने पूछा।
‘ नहीं, ये लफ़्फ़ाज़ी से बाहर आकर ज़मीनी सच्चाई से जुड़ना था। पत्रकारिता का काम है, लोगों को अपने अधिकार के लिए जागरूक करना, एजुकेट करना। लेकिन जब वह शोषकों के साथ खड़ी हो, जनता के विरुद्ध हो जाय तो क्या किया जा सकता है? मैंने यहां के लोगों को जागरूक करने के काम को चुना। कह सकते हो, पत्रकारिता से बदला नहीं, उसके धर्म का निर्वाह कर रहा हूं।’ संयत शांत मुस्कान थी मिलन दास के चेहरे पर।
ऐन इसी वक़्त घर के अंदर से एक पंद्रह-सोलह साल की लड़की एक ट्रे में तीन गिलास पानी और चाय के कप लेकर आई और एक छोटे से गोल टेबल पर रखने लगी, तो मिलन दास ने उसका परिचय कराया,’ यह है मेरी बेटी मुक्ति दास।’
मुक्ति ने हाथ जोड़कर अभिवादन किया। मुक्ति को गौर से देखती मिनी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे। मुक्ति वापस जाने के लिए मुड़ गई थी। मिलन दास ने मुक्ति को रोकते हुए निर्देश दिया,’ बेटा , मां को बोलो,ये लोग खाना खाकर जायेंगे।’
मिनी का आश्चर्य सातवें आसमान पर जा पहुंचा था। वह कभी मिलन दास को देखती, कभी पलट कर पिता की बात सुनती मुक्ति को। तभी जय पात्रा ने हड़बड़ा कर बरजा,’ नहीं सर, हम खाना खाकर आये हैं। आज ही भुबनेश्वर लौटना है। खाना फिर कभी ।’
मुक्ति घर के अंदर जाने के लिए मुड़ी, कि मिनी भी उसके साथ हो ली। उसकी जिज्ञासा मुक्ति की मां से मिलने को हो आई थी। यह कच्ची दीवारों और खपरैलों वाला कमरा था, जिसमें व्हील चेयर पर बैठी औरत की ओर इशारा कर मुक्ति ने बताया,’ ये मां है!’
व्हील चेयर पर बैठी उस सांवाली औरत को मिनी विस्मय और सम्मोहन के बीच खड़ी एकटक देखती रही। उसके हाथ जुड़े थे। होंठ भिंचे थे। मुक्ति बता रही थी,’ मां, चल नहीं सकती। लेकिन सारा काम कर लेती है।’
‘ क्यों नहीं चल सकतीं? क्या हुआ इनको? ‘ मिनी अपने विस्मय से बाहर निकली।
मुक्ति के बजाय मां ने उत्तर दिया,’ बेटा, एक संघर्ष के दौरान गुंडों की गोली लगी थी। उसी से कमर के नीचे का हिस्सा पैरालाइज हो गया।’
मिनी की आँखें फैल गईं। एक के बाद एक सामने आते आश्चर्यों से वह ख़ुद को जैसे किसी रहस्यलोक में पा रही थी। बाहर बैठे उसके पिता मिलन दास। यहां सामने व्हील चेयर पर बैठी उनकी योद्धा पत्नी और इन दोनों की ये मासूम बेटी मुक्ति। इनमे वह कहां है? वह यहां क्यों है? उसकी यह कैसी यात्रा है, जिसमें उसे जो मिला वह उसकी कामना नहीं थी, और जिसकी तलाश थी वह मिलकर भी कहां मिला? वह अपनी यात्रा के गंतव्य और तलाश के अप्रत्याशित अंत पर पहुंचकर किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो आई थी। उसे चुप देख मां ने कहा,’ बेटा, आपलोग खाना खाकर जाना… मैं तैयार करती हूं।’
अपने आप में लौटी मिनी ने झट से झुककर उनके पांव छूते हुए मना किया,’ नहीं… नहीं… हमें लौटने की जल्दी है।’
मिनी के सिर पर हाथ फेरती मां ने कहा,’ अरे, ऐसी क्या जल्दी है। इतनी दूर से आई हो, तो यहां के जीवन को देखो। यहां के व्यंजन को चखो!’
दिल-दिमाग़ के द्वन्द में फंसी मिनी की आँखें धुंधला गई थीं। इससे पहले कि कंठ अवरुद्ध हो,वह क्षमा-याचना की मुद्रा में दोनों हाथ जोड़कर, तेज़ क़दमों से बाहर चली आई। उस पर नज़र पड़ते ही जय ने पूछा,’ क्या इरादा है? चलें वापस?’
मिनी का कंठ अभी भी अवरुद्ध था। इससे पहले कि उसके जज़बात बेकाबू हों, इससे पहले कि वह इस से टकराये, उसने सिर हिलाकर चलने का इशारा किया। जय पात्रा और रितेश उठ खड़े हुए। अवाक मिलन दास ने कहा,’ रुकते तो अच्छा होता!’
उनके इस आग्रह का उत्तर दिये बगैर मिनी जय पात्रा की मोटरसाइकिल पर जा बैठी थी। मिलन दास उन्हें विदा करने बाहर तक आये थे। रितेश ने मोटरसाइकिल स्टार्ट कर दी थी। मोटरसाइकिल पर बैठी मिनी ने मुड़कर देखा था। मिलन दास के हाथ जुड़े हुए थे। वह उन्हें तबतक देखती रही थी, जब तक उनकी छवि ओझल नहीं हो गई थी।
गांव से बाहर निकल कर जय पात्रा ने पूछा,’ तुम्हारी तलाश पूरी हुई?’
मिनी ने कोई ज़वाब नहीं दिया। वह अपने में खोई-सी थी। जय पात्रा ने गर्दन घुमाकर पीछे देखा। मिनी को चुप देख, टोकना उचित नहीं समझा।
यह मिनी की यात्रा थी। तलाश की यात्रा … अंवेषण की यात्रा…रहस्यलोक की यात्रा … लौटती की यात्रा…। मॉम पूछेगी, इस यात्रा का हासिल क्या रहा… क्या ज़वाब देगी वह? उसकी आंखों में पिता की वह छवि बार- बार तैर आती है, जब विदा के समय उनके हाथ जुड़ गये थे। क्या यह क्षमा याचना थी? क्या यह पहचान बोध था…? पूछेगी मां से।

विदा की सुबह जय पात्रा ने मिनी से कहा,’ मुझे नहीं पता, तुम्हें इस यात्रा से क्या मिला, लेकिन मुझे पता है, कि तुम्हारी यात्रा में मेरा होना भी शामिल है।’
मिनी मुस्कुराई और जय पात्रा से हाथ मिलाते हुए बोली,’ जय, किसी यात्रा का हासिल कोई गंतव्य हो ज़रूरी नहीं। मेरे लिए तो इस यात्रा का हासिल वह दूरी है जो मैंने तय की है। इस हासिल में तुम भी हो। शायद हम फिर किसी यात्रा के दौरान मिलें, तबतक तुम बहुत याद आओगे।’
ट्रेन चल पड़ी थी। दृश्य पीछे छूटते जा रहे थे….मिलन दास… मुक्ति… मुक्ति की मां… जय पात्रा…एक-एक कर सभी पीछे छूटते जा रहे थे।
मिनी ने पीछे मुड़कर देखने से ख़ुद को रोका।


-अवधेश प्रीत

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